सबकी आन सबकी शान ये है अपना सलमान

सबकी आन सबकी शान ये है अपना सलमान-अजय ब्रह्मात्‍मज

फि ल्मों में अपनी जगह बनाने की गरज से कुछ-कुछ कर रहे सलीम खान ने सुशीला से शादी कर उन्हें सलमा नाम दिया था। पहली संतान के आने की आहट थी। मुंबई में देखभाल का पर्याप्त इंतजाम नहीं था तो उन्हें पुश्तैनी घर इंदौर छोड आए। इंदौर में ही अब्दुल रशीद सलमान खान का जन्म हुआ। बडे होकर वे सलमान खान के नाम से मशहूर हुए।

छोटे शहर का हीरो

27 दिसंबर 1965 को जन्मे सलमान खान अपनी जिंदगी में इंदौर का बडा महत्व मानते हैं। इंदौर में अपनी पैदाइश और बचपन की वजह से सलमान हमेशा कहते हैं कि मैं तो छोटे शहर का लडका हूं। अपने देश को पहचानता हूं। मेरी रगों में छोटा शहर है। शायद इसी वजह से देश के आम दर्शक मुझे अपने करीब पाते हैं। मेरी अदाओं और हरकतों में उन्हें अपनी झलक दिखती है। मेरी शैतानियां उन्हें भाती हैं, क्योंकि मैं उनसे अलग नहीं हूं।

सलमान के बचपन की सनक और शरारतों के जानकार बताते हैं कि सलीम खान को उनसे कोई उम्मीद नहीं थी। तीनों भाइयों में अरबाज खान ज्यादा तेज दिमाग के थे। वे शांत और समझदार भी थे। सलमान सनकी होने के साथ जिद्दी भी थे। किसी बात पर अड गए तो मां के सिवा किसी और की बात नहीं मानते थे। आज भी पिता सलीम और मां सलमा ही सलमान की मर्जी के खिलाफ जा सकते हैं या अपनी बात मनवा सकते हैं। सलमान खान ज्यादा बातें और बहस नहीं करते। घर-परिवार, करियर, दोस्ती, चैरिटी जैसे सभी मामलों में वे गौर से सबकी बातें सुनते हैं और उसे गुनते रहते हैं। बातें खत्म होने पर वे थोडी देर के लिए खामोश रहते हैं। तब उनकी पुतलियां बंद पलकों के अंदर बहुत तेज घूमती हैं। मानो वे आगत फैसले को देख रही हों और फिर सलमान खान संक्षेप में अपनी बात कहते हैं और निकल जाते हैं। सभी जानते हैं कि उसके बाद कुछ भी नहीं बदलता। वह अंतिम फैसला होता है। उस फैसले को बदलने का अधिकार केवल मां या पिता को है, लेकिन अधिकतर मामलों में उन्हें अपने बेटे का फैसला सही लगता है। सलमान खान दुनियावी या व्यावहारिक नहीं हैं। कई बार उन्हें अपने फैसलों का परिणाम भुगतना पडता है। लेकिन वे बाज नहीं आते। हमेशा की तरह दिल की सुनते हैं, मानते हैं, उसी पर अमल करते हैं।

रोमैंटिक हीरो

पिता सलीम खान बडे लेखक हो गए थे, लेकिन सलमान के फिल्मों में प्रवेश करने के समय उनके लेखन करियर की सांझ चल रही थी। दोनों चाहते भी नहीं थे कि विशेष लांचिंग के लिए किसी की मदद ली जाए। उनकी एक फिल्म बीवी हो तो ऐसी शुरू भी हो चुकी थी। इसी बीच सलमान को पता चला कि राजश्री प्रोडक्शन के सूरज बडजात्या अपनी पहली फिल्म के लिए नए चेहरे की तलाश कर रहे हैं। सूरज मन बना रहे थे कि आशुतोष गोवारीकर व भाग्यश्री को वे अपनी फिल्म में मौका देंगे। तब दोनों का सीरियल धूप छांव टीवी पर आ रहा था। कहते हैं कि जानकारी के बावजूद सलमान खान उनसे मिलने गए। उन्होंने सूरज बडजात्या को इस कदर प्रभावित किया कि आशुतोष की छंटनी हो गई और वे उनकी फिल्म के हीरो हो गए। सूरज बडजात्या की पहली फिल्म मैंने प्यार किया से सलमान ने रोमैंटिक हीरो की पहचान बनाई और प्रेम के नाम से विख्यात हुए। उन्हें अपना यह नाम बहुत पसंद है। कई फिल्मों में वे इसी नाम से आए हैं।

बरकरार है जादू

सलमान खान अपनी फिल्मों और अदाओं से हमेशा दर्शकों के चहेते बने रहे। गौर करें तो उन्होंने कला और कथ्य के लिहाज से कोई उल्लेखनीय फिल्म नहीं की, फिर भी पिछले 22 सालों से वे पॉपुलर हैं। कुछ खास जादू है उनमें, जो पर्दे पर चमत्कार करता है और आम दर्शकों को उनका दीवाना बना देता है। आलोचकों और सुधी दर्शकों ने उन्हें कभी अधिक पसंद नहीं किया, लेकिन उन्हें इसकी फिक्र नहीं है। वे स्पष्ट कहते हैं, मैं दर्शकों का अभिनेता हूं। अगर दो-चार समीक्षकों को मेरी फिल्में नापसंद हैं तो क्या फर्क पडता है? देश के करोडों दर्शक मुझे पसंद कर रहे हैं न! मैं उनका मनोरंजन करता हूं। मुझे इसी बात की संतुष्टि है कि वे मुझे देखकर खुश होते हैं। दर्शकों की खुशी के लिए सलमान कुछ भी करने को तैयार रहते हैं।

निजी मदद करने से भी नहीं हिचकिचाते। यही चैरिटी उन्हें जेब पर भारी पडने लगी तो उन्होंने बीइंग ह्यूमन ट्रस्ट स्थापित किया और अब उसके जरिये जरूरतमंदों की मदद जारी है। दस का दम में बडी उम्मीद से आए एक प्रतियोगी को मौका नहीं मिला तो सलमान ने उसे अपनी तरफ से एक लाख देने में हिचक नहीं की।

संस्कार में है चैरिटी

सलमान पर पिता सलीम खान का अंकुश काम करता है। चैरिटी, मदद और जकात पर वे नजर रखते हैं। अगर छूट दे दी जाए तो सलमान अपनी जरूरत भर के पैसे रख कर सब कुछ दान में दे दें। चैरिटी उनके संस्कार में है। सलमान मानते हैं कि वे जो भी कमाते हैं, उसका 20 प्रतिशत उनके निजी उपयोग के लिए काफी है। बाकी 80 प्रतिशत दान किया जा सकता है। जब उनसे पूछा जाता है कि क्या उन्हें अपने बुढापे की चिंता नहीं है तो उनका कहना होता है, मरते दम तक मैं काम करता रहूंगा। मालूम है कि मैं हमेशा हीरो नहीं रह सकता। उम्रदराज होने पर मैं कैरेक्टर रोल करने लगूंगा, चाचा-ताया की भूमिका में आने लगूंगा। अगर वह भी नहीं मिला तो ऐक्शन डायरेक्टर बन जाऊंगा। मुझे अपनी चिंता नहीं है। अपनी आमदनी के लिए कुछ न कुछ करता रहूंगा।

आम दर्शक सलमान को मुख्य रूप से अभिनेता के तौर पर जानते हैं। लेकिन इन दिनों वे लेखन, ऐक्शन, डांस, संगीत, संवाद जैसे सभी क्रिएटिव क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। वे अपने अनुभवों व दर्शकों की समझ से सब कुछ बदलते हैं। मजेदार तथ्य है कि दबंग की ओरिजनल स्क्रिप्ट अभी तक ज्यों की त्यों बची हुई है। हमने जो फिल्म देखी, वह मूल ढांचे पर सलमान द्वारा तैयार की गई फिल्म है। वांटेड के बाद से सलमान ने तय किया है कि वे फिल्म की क्रिएटिव लगाम अपने हाथों में रखेंगे। नतीजा सभी के सामने है। उनकी फिल्में दर्शकों को पसंद आ रही हैं और वे बिजनेस भी कर रही हैं।

सदाबहार लोकप्रियता

पिछली मुलाकात में मैंने उनसे पूछा था कि दर्शकों से उनका कैसा कनेक्शन है? क्या उसे परिभाषित किया जा सकता है? उनकी पॉपुलैरिटी का विश्लेषण किया जा सकता है? सलमान ने सरल शब्दों में बताया कि दर्शक जब हमारी ताजा फिल्म देखने आते हैं तो उनके मन में हमारी पुरानी छवि रहती है। मेरी पुरानी फिल्में, भूमिकाएं, मेरी निजी जिंदगी, मेरी चैरिटी, मेरा स्वभाव और मेरी इमेज.. इन सभी के सम्मिलित प्रभाव के साथ ही फिल्म का अपना असर होता है। ज्यादातर पॉपुलर और पुराने ऐक्टर के साथ यही बात होती है। यही वजह है कि हम सभी की फिल्मों को ओपनिंग मिलती है। पहले दो-तीन दिन दर्शक पिछले प्रभाव में आते हैं। उसके बाद अगर फिल्म में दम हो तो फिर वह चलती है। हमारा ब्रैंड बडा होता है और हमारी इमेज भी गहरी होती है। दर्शकों को हमारी अगली फिल्म का इंतजार रहता है।

सलमान फिल्म समीक्षकों और इतिहासकारों की समझ और विश्लेषण पर गौर नहीं करते। उनका क्रेज देश के बहुसंख्यक निम्न मध्यमवर्गीय व गरीब तबके के दर्शकों के बीच ज्यादा है। मुंबई में तबेले और चालों के बच्चे उनके नाम की माला जपते हैं। उनकी फिल्मों में एक गैर-इरादतन बदतमीजी रहती है, जो बच्चों, किशोरों और युवकों को बहुत पसंद आती है। उनकी फिल्मों में हीरो-हीरोइन का रिश्ता छेडखानी और बदतमीजी से भरा रहता है, जिसमें हीरो आमतौर पर हीरोइनों से दूर रहने या भागने की कोशिश करता है। हीरो जमीर का पक्का होता है। अपनी कही बातों से मुकरता नहीं और वादा कर लिया तो फिर जान पर खेल कर भी उसे पूरा करता है। हिंदी सिनेमा की गढी गई इस परिकथा को उनकी फिल्में आज भी बखूबी पेश करती हैं और दर्शकों का दिल जीत लेती हैं। बॉडीगार्ड की रिलीज के समय भयंकर दर्द के बावजूद उन्होंने अपने कमिटमेंट पूरे किए और कैमरे के आगे मुस्कराते रहे।

उदारता का आलम

दयालुता का आलम एक परिचित बताते हैं। बांद्रा के एक स्कूल में सलमान पढा करते थे। वहां लंच ब्रेक में बांद्रा से दूर के बच्चों को दिक्कत होती थी। एक टीचर ने सुझाव दिया कि अगर बांद्रा के लडके अपने सहपाठियों को लंच में बारी-बारी साथ ले जाएं तो उन्हें सहूलियत होगी। सलमान दस सहपाठियों को लेकर घर पहुंच गए। मां ने सभी के लिए लंच तैयार किया। यह सिलसिला लगभग दो साल तक चला। खाने-खिलाने के शौकीन सलमान आज भी शूटिंग में घर से लंच मंगवाते हैं। एक खास जीप है, जिसमें टिफिन व कंटेनर लाने-ले जाने का इंतजाम है। कम से कम पंद्रह व्यक्तियों का लंच तैयार होता है। वह ज्यादा नखरैल नहीं हैं। बताते हैं कि रात में देर से लौटने पर वे किसी को तंग नहीं करते। किचन में जाकर बचे-खुचे खाने को पैन में रखते हैं और घी का तडका लेकर स्पेशल मिक्स डिश का आनंद उठाते हैं।

सलमान को पेंटिंग का सलीका अपनी मां से मिला है। शादी के कई सालों बाद तक सलमा पेंटिंग करती रही थीं। सलमान को नींद नहीं आती। रात में जागने और दोस्तों के साथ मौज-मस्ती करने का उन्हें शौक है। कई बार दोस्त नहीं होते या उनका मूड मौज-मस्ती करने का होता है तो वे पेंटिंग करते हैं। सलमान ने अपनी ज्यादातर पेंटिंग्स रात में तैयार की हैं। इसी कारण उनमें एक अलग रंग और छटा दिखाई पडती है। उनकी पेंटिंग में उदासी, एकाकीपन और छटपटाहट जाहिर होती है, जो वास्तव में सलमान का निजी एकांत है। अपनी लोकप्रियता और व्यस्तता के बीच भी निहायत अकेले हैं सलमान खान।

निजता में प्रवेश

उनके पिता कहते भी हैं सलमान खान के जीवन में आई लडकियों में से कोई भी उनके इस एकांत में प्रवेश नहीं कर सकी। कुछ सालों और समय के बाद अपना स्वार्थ पूरा कर सारी लडकियां चलती बनीं। केवल ऐश्वर्या राय से उनका प्रेम गहरा और वास्तविक था, लेकिन सलमान खान ने अपने स्वभाव के भटकाव और अपनी आदतों के कारण उन्हें खो दिया।

अपनी सारी उदारता और दयालुता के बावजूद सलमान खान में एक सामंती पुरुष भी है, जो औरतों को सिर्फ बहन और मां के रूप में ही इज्जत देना जानता है। प्रेमिकाओं से उनके संबंध बराबरी और आदर के कभी नहीं रहे। ऊपरी तौर वे कहते हैं कि शादी बच्चों के लिए की जाती है। मेरे परिवार में पहले से इतने बच्चे हैं कि मुझे शादी की जरूरत ही नहीं है। लेकिन सच्चाई यह है कि सलमान को किसी प्रकार का बंधन एक सीमा के बाद स्वीकार नहीं होता। हालांकि वे अपने भाई-बहनों के लिए कुछ भी कर सकते हैं। फिलहाल तो एक-एक कर वे सभी को सफल निर्माता बना रहे हैं। उनकी फिल्में कर रहे हैं।

बादशाहत का भ्रम

सलमान खान को महेश भट्ट मौलिक शैतान छोकरा कहते हैं। उनके खयाल में सलमान खान की शैतानी कई बार उद्दंडता में बदल जाती है। वास्तव में सलमान खान जिस तरह की सीमित दायरे की जिंदगी जीते हैं, उसमें उन्हें दुनिया के दस्तूर से विशेष मतलब नहीं रहता। ऐसे सफल व्यक्ति खुद को अपनी दुनिया का बादशाह समझने की गलती कर बैठते हैं। उन्हें लगता है कि वे कानूनों, नियमों और बंधनों से परे हैं। ऐसे में उनके परिजनों और परिचितों की मुसीबतें बढती हैं। लोग पूछते हैं कि सलीम-जावेद की जोडी टूटने के बाद से सलीम खान और कुछ क्यों नहीं रच पाए। वास्तव में सलीम खान की पूरी ऊर्जा अपने इस शैतान बेटे को संभालने में ही गुजरती रहती है। सलमान खान सलीम खान की सर्वश्रेष्ठ रचना हैं।

Comments

Seema Singh said…
जाने - अनजाने दुनियां के तमाम सबक सलमान ने आसमान की ओर सिर उठा खुली आँखों से देखकर सीखे हैं -शायद इसीलिए उन्होंने दुनियावी जज्बाती ठोकरे भी बहुत खाई और जीवन की कठोर ,कटु व् तल्ख सच्चाइयों को देखा और जिया भी खूब है -ऐसी बेरहम परिस्थित जन्य बदसलुकियाँ- जिन्दगी जब किसी के साथ करती है ,तब इन्सान का बौखलाहट भरा व्यवहार करना बहुत हद तक लाजमी है -इन्सान हालात की कठपुतली ही तो है ., ऐसे में सलमान यदि दबंग या बिगड़े दिल -शहजादे हैं ,इसमें उनका कोई बढ़ा कसूर नहीं .?मनोविज्ञान -पद्धति के परिक्षेपमें सलमान के व्यक्तित्व के व्यवहार का अवलोकन करे तब ऐसा प्रतीत होता है -की उनका बचपन शंकाओं और असुरक्षा से घिरे वातावरण व् करुणाऔर वात्सल्य के अभाव में बड़ा हुआ है -इसी कारण से वह अपने सम्पर्क में आने वाले करेक्टरों से -समझदारी और ईमानदारी की अपेक्षा करते हैं और अपेक्षा भी ऐसी -जो माँ के सान्निध्य में महसूस करते हैं , आगे इसी भावना से अविभूत और प्रेरित-वह अपने परिवरीय जन सदस्यों को अपने विश्वास ,संरक्षण और सुरक्षा देने के आश्वासन की आँखें मूद कर हामी भरते हैं , इस तरह के व्यक्तित्व के लोग -अक्सर भावना के अतिरेक में कभी -कभी ऐसा भी कर गुजरते हैं ,जिसकी सामान्यता कल्पना करना भी असम्भव प्रतीत होता है ..इस स्वभाव के लोग भरोसा बहुत किसी पर नहीं कर पाते ....,आप्रप्त चीजों के पीछे दौड़ते हैं -मिल जाए तो कद्र नहीं का पाते..., इच्छित बस्तु न मिल सके -तब उनके लिए -सारी खुदाई एक तरफ और वह एक तरफ आदि आदि ......

Popular posts from this blog

लोग मुझे भूल जायेंगे,बाबूजी को याद रखेंगे,क्योंकि उन्होंने साहित्य रचा है -अमिताभ बच्चन

फिल्‍म समीक्षा : एंग्री इंडियन गॉडेसेस

Gr8 Marketing turns Worst Movies into HITs-goutam mishra