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Sunday, March 10, 2013

आस्कर में आंग ली की नमस्ते


-अजय ब्रह्मात्मज
    पिछले हफ्ते आस्कर अवार्ड का लाइव टेलीकास्ट देश में देखा गया। इस बार भारत में इसके दर्शकों की संख्या बढ़ी। सोशल मीडिया नेटवर्क पर भी आस्कर अवार्ड पर काफी विमर्श हुआ। समारोह की रात (भारत में सुबह) के पहले से ही उत्साही भविष्यवाणियां कर रहे थे। सभी की अपनी ‘विश लिस्ट’ थी। इस बार एक अच्छी बात हुई थी कि आस्कर अवार्ड की विभिन्न श्रेणियों में नामांकित फिल्में भारत में देखी जा चुकी थीं। विदेशी प्रोडक्शन हाउस अब अमेरिका के साथ ही भारत में फिल्में रिलीज कर रहे हैं। मल्टीप्लेक्स और मैट्रो के दर्शकों का एक समूह हालीवुड की फिल्मों में रुचि लेता है। इस बार आस्कर के लिए नामांकित अधिकांश फिल्में अपने कंटेंट और लेखन के लिए सराही गई हैं। कहा जा रहा है कि हालीवुड में 2012 लेखकों का साल रहा। 2012 में हिंदी फिल्मों में भी लेखकों ने विविधता दिखाई है, लेकिन सारा क्रेडिट डायरेक्टर, प्रोड्यूसर और कारपोरेट प्रोडक्शन हाउस ले गए।
    आस्कर अवार्ड की विदेशी भाषा श्रेणी में हर साल भारत से एक फिल्म जाती है। नामांकन सूची तक भी ये फिल्में नहीं पहुंच पातीं। फिर भी हर साल भेजी गई फिल्मों को लेकर चर्चा होती है। असंतुष्टों का समूह हमेशा फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया के चुनाव की आलोचना करता है। उनकी राय में हम अपनी बेहतरीन फिल्म नहीं चुन पाते। इस साल अनुराग बसु की ‘बर्फी’ भेजी गई थी। हालांकि भारत के सभी पुरस्कारों में ‘बर्फी’ की धूम रही, लेकिन हम जानते हैं कि आस्कर में यह फिल्म नामांकन सूची में नहीं आ सकी थी। चर्चा है कि कारपोरेट प्रोडक्शन हाउस यूटीवी अपने तीन सफल निर्देशकों को यह पता करने के लिए हालीवुड भेज रहा है कि आखिर हम आस्कर में क्यों पिछड़ जाते हैं? हम किस तरह की फिल्में बनाएं कि उन्हें आस्कर के योग्य समझा जाए। अनुराग बसु, अभिषेक कपूर और राजकुमार गुप्ता की टीम जल्दी ही हालीवुड जाएगी। यूटीवी की इस कोशिश का सकारात्मक नतीजा निकले तो प्रयास सफल होगा। वैसे, आस्कर को ध्यान में रख कर बनाई गई फिल्म का प्रयोजन गलत लगता है। मेरी राय में हमें भारतीय समाज और संस्कृति से जुड़ी अपनी शैली की फिल्में बनानी चाहिए। हम अपनी विशिष्टता की वजह से पुरस्कार जीतें। आस्कर को ध्यान में रख कर बनाई गई फिल्म के पुरस्कार जीतने की संभावना कम है।
    इस साल आस्कर पुरस्कार की रात कुछ भारतीय मूल के कलाकार और तकनीशियन वहां दिखे। अनुपम खेर गए थे। उनके अलावा ‘लाइफ ऑफ पाई’ के अभिनेता सूरज शर्मा और गायिका बांबे जयश्री को भी लोगों ने वहां देखा। ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ से ख्याति हासिल कर चुके देव पटेल तो वहीं व्यस्त हैं। इस बार एक और उल्लेखनीय बात हुई। भारतीय उद्योगपति अनिल अंबानी अपनी अभिनेत्री पत्नी टीना अंबानी के साथ वहां मौजूद थे। कम लोगों को मालूम होगा कि रिलायंस और स्टीवन स्पीलवर्ग फिल्म निर्माण में पार्टनर हैं। आस्कर अवार्ड के लिए नामांकित ‘लिंकन’ के सहनिर्माता अनिल अंबानी भी थे। सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए नामांकित फिल्मों के फुटेज दिखाते समय इरफान खान के दृश्य का अंश चुना गया था। इरफान की आवाज ने सभी भारतीय दर्शकों को रोमांचित किया।
    आंग ली की फिल्म ‘लाईफ ऑफ पाई’ को चार पुरस्कार मिले। ओरिजनल सौंग, सिनेमैटोग्राफी, वीएफएक्स और डायरेक्शन के लिए पुरस्कृत ‘लाईफ ऑफ पाई’ की टीम भारतीय थी। इसमें अनेक भारतीय कलाकारों और तकनीशियनों ने हिस्सा लिया था। वीएफएक्स के कुछ हिस्सों का काम भारत में किया गया था। फिल्म के मुख्य कलाकार पाई की भूमिका सूरज शर्मा ने निभाई थी। आंग ली ने पुरस्कार लेने के बाद भारतीय टीम को याद किया। सूरज शर्मा को उन्होंने चमत्कार कहा। अपने संभाषण के अंत में नमस्ते कह कर उन्होंने भारतीय अभिवादन को आस्कर के मंच पर पहुंचा दिया।
    ऐसा लग रहा कि हम आस्कर के बहुत निकट पहुंच चुके हैं। मेरा मानना है कि दो-तीन सालों में भारत में बनी और हालीवुड में रिलीज हुई अंग्रेजी फिल्में आस्कर प्रतियोगिता का हिस्सा बनने लगेंगी। विदेशी भाषा की श्रेणी के लिए भेजी जाने वाली फिल्मों के कंटेंट पर भी ध्यान दिया जाएगा। सबसे जरूरी है कि हम अपनी विशेषताओं का निर्वाह करते हुए ही सब कुछ सुधारें। अपनी फिल्मों में भारत की कहानी कहें। कोशिश रहे कि पहले भारतीय दर्शक संतुष्ट होंगे। एक्सपोर्ट क्वालिटी सिनेमा भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। हमें ऐसे लोभ में फंसना भी नहीं चाहिए।

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