दरअसल :थिएटर, प्रशिक्षण और अभिनय


-अजय ब्रह्मात्मज

    आए दिन हिंदी फिल्मों के स्टार अपने इंटरव्यू में यह कहते मिल जाते हैं कि अभिनय जन्मजात प्रतिभा है। या तो आप अभिनय कर सकते हैं या नहीं कर सकते। अभ्यास या प्रशिक्षण से कोई अभिनेता नहीं बनता। वे अपना या अपने सरीखे दूसरे स्टारों का उदाहरण देने से भी नहीं हिचकते। एक बार मैं एक पापुलर अभिनेत्री का इंटरव्यू कर रहा था। उनसे भी अभिनय के कौशल पर बात चली। उन्होंने एनएसडी और थिएटर से आई कुछ अभिनेत्रियों का हवाला दिया अैर पूछा कि बताएं इतनी टैलेंटेड होने के बाद भी वे क्यों नहीं चल पाईं? उन्हें अभिनय की संपूर्ण जानकारी है, लेकिन दर्शक उन्हें नहीं अपनाते। उनसे बहस करना फिजूल था, क्योंकि वह प्रतिभा को पैसे और लोकप्रियता के अनुपात में आंक रही थीं।
    सिद्ध अभिनेता और प्रसिद्ध स्टार में फर्क होता है। अमिताभ बच्चन प्रसिद्ध स्टार हैं, जबकि नसीरुद्दीन शाह सिद्ध अभिनेता हैं। नाम, शोहरत और कमाई में नसीरुद्दीन शाह और अमिताभ बच्चन की कोई तुलना नहीं हो सकती। इसके बावजूद 20-25 सालों के बाद दोनों की फिल्में देखने-दिखाने की बात होगी तो निस्संदेह शेल्फ पर नसीरुद्दीन शाह की अधिक फिल्में होंगी। फिल्मों के इस महत्व में कलाकार के अंतर्निहित योगदान की व्याख्या पर पाना थोड़ा मुश्किल काम है, क्योंकि इससे लोकप्रिय स्टार का अहं आहत हो सकता है। वत्र्तमान में उसी की जय होती है, जो लोकप्रिय है। समय बीतने के साथ वह महान और महत्वपूर्ण होता है, जो सघन और सक्रिय है।
    हिंदी फिल्म इंडस्ट्री मुख्य रूप से स्टार केंद्रित थी और है। वैश्विक दौर में सिनेमा के बदलते रूप-स्वरूप से परिचित होने के बाद भी हिंदी सिनेमा में गुणात्मक बदलाव नहीं आ सका है। साल में दो अलग किस्म की फिल्में दर्शक पसंद कर लेते हैं तो सभी बताने और स्थापित करने लगते हैं कि दर्शकों की रुचि बदल रही है। यह कड़वी सच्चाई है कि हिंदी फिल्मों के मनोरंजन की परंपरा ने दर्शकों को अकर्मण्य बना दिया है। वह मानसिक मेहनत नहीं चाहता। तर्क दिया जाता है कि भारतीय दर्शक मनोरंजन की थाली चाहता है, जिसमें हर किस्म का स्वाद हो। मनोरंजन और उसके प्रभाव का यह ऐसा दुष्चक्र है, जिस से हिंदी फिल्में लाख प्रयत्नों के बावजूद नहीं निकल पा रही हैं। अलग किस्म की फिल्मों की तात्कालिक चर्चा के बाद फिर से वही ढाक के तीन पात हो जाते हैं। फिर वही मसाला एंटरटेनमेंट, 100 करोड़ और स्टार सिस्टम।
    इसी परिस्थिति का परिणाम है कि हिंदी फिल्मों में थिएटर या प्रशिक्षण हासिल कर आए अभिनेताओं को दोयम दर्जे का समझा जाता है। उन्हें तरजीह नहीं दी जाती है। फिल्मों में सहायक और चरित्र भूमिकाओं में उन्हें किसी इमारत की स्तंभ की तरह इस्तेमल किया जाता है, लेकिन उस इमारत में कंगूरे कथित सितारों  के ही लगते हैं। दशकों से मैं थिएटर से अभिनेताओं की यह शिकायत सुनता आ रहा हूं कि उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं दिया जाता। पहचान में आने के बाद किसी अभिनेता ने पारिश्रमिक बढ़ाने की बात कर दी तो सभी उसे औकात बताने लगते हैं। ताने दिए जाते हैं कि तेरा चेहरा पोस्टर पर डाल दें तो दर्शक सिनेमाघर में नहीं आएगा। कौन पूछता या चाहता है तुम्हें? 
    पिछले कुछ दशकों की हिंदी फिल्मों पर गौर करें तो अभिनय, संवाद अदायगी, एक्सप्रेशन सब में भारी बदलाव आ गया है। पारसी थिएटर के प्रभाव से निकली हिंदी फिल्में अब अप्रत्यक्ष रूप से थिएटर से आए कलाकारों से प्रभावित है। एक्टिंग को रियल बनाने में थिएटर से आए कलाकारों का बड़ा योगदान है। ये कलाकार स्वयं भले ही स्टर नहीं बन पाए हों, लेकिन अपनी मौजूदगी और सक्रियता से उन्होंने परफारमेंस का तरीका बदल दिया है। शायद कभी ऐसा वक्त आए जब इन कलाकारों को सितारों के समकक्ष समझा जाए और समान सम्मान दिया जाए।

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