चांद और हिन्दी सिनेमा

चवन्नी ने हाल में ही सबसे बड़ा चांद देखा.हिन्दी फिल्मों में शुरू से चांद दिखता रहा है.फिल्मी गीतों चांद का प्रयोग बहुतायत से होता रहा है।गुलजार की हर फिल्म चांद के गीत से ही पूरी होती है.चवन्नी को कुछ गीत याद आ रहे हैं.कुछ आप याद दिलाएं.

-चंदा ओ चंदा...
-चंदा है तू मेरा सूरज है तू
-चांद आहें भरेगा...
-चांद को क्या मालूम...
Show keyboardमाफ करें आज कीबोर्ड नाराज दिख रहा है।मैं अपनी सूची नहीं दे पा रहा हूं.

क्या आप सभी एक -एक गीत टिप्पणियों में देंगे?

Comments

Yunus Khan said…
अभी तो हम जल्‍दी में हैं शाम तक इत्‍ती लंबी लिस्‍ट बताएंगे कि आप चकित रह जाएं
वैसे यहां देखें ज़रा--
http://www.giitaayan.com/search.asp?browse=stitle&s=chand
Sajeev said…
ये तो बहुत आसान है भाई - जल्दी में सुने -
चाँद को क्या मालूम
मैंने पूछा चाँद से
चाँद मेरा दिल
चन्दा रे चन्दा रे,
चेहरा है या चाँद खिला है..... अरे भाई बहुत हैं....
दो तो मै भी सुना सकती हूं……

चाँद मेरा दिल
चाँदनी हो तुम
चाँद से है दूर
चाँदनी कहां………,

2
मेरे सामने वाली खिड़की मे
एक चाँद का ्टुकड़ा रहता है……,
Rajendra said…
चाँद सी मेहबूबा हो मेरी कब ऐसा मैने सोचा था.
चाँद सा मुखरा क्यूं शरमाया, आँख मिली और दिल घबराया .
चाँद फिर निकला मगर तुम ना आए, जला फिर मेरा दिल करूँ क्या मैं हाए.
चाँद मेरा दिल चाँदनी हो तुम चाँद से बढ़कर तुम हो मेरी जाना.
चाँद को क्या मालूम चाहता है उसे कोई चकोर.
चाँद छुपा और तारे डूबे रात ग़ज़ब की आई.
चाँद आहें भरेगा फूल दिल थाम लेंगे हुस्न की बात चली तो सब तेरा नाम लेंगे.
चाँद को देखो जी, मस्ती लुटाए जादू जगाए दिल में हमारे जी.
चंदा ओ चंदा किसने चुराई तेरी मेरी निंदिया.
Udan Tashtari said…
ये तो चिटिंग है. सबको एक एक देना था..चार ने मिलकर ही सारे लिख डाले-अब हम क्या खुद रचे नया गीत??


चवन्नी भाई, हम अपना खुद का लिखा भेज रहे हैं, जरा किसी फिल्म या सिरियल के लिया गवा तो दिजिये-ये सब चिटिंग करने वाले देखते रह जायेंगे: :)

अभी बस चांद उगता है, सामने रात बाकी है
बड़े अरमान से अब तक, प्यार में उम्र काटी है
पुष्प का खार में पलना,विरह की आग में जलना
चमन में खुशबु महकी सी, प्रीत विश्वास पाती है.

गगन के एक टुकड़े को, हथेली में छिपाया है
दीप तारों के चुन चुनकर, आरती में सजाया है
भ्रमर के गीत सुनते ही, लजा जाती हैं कलियां भी
तुम्हारी राह तकते हैं, तुम्हें दिल में बसाया है.

तुम्हीं हो अर्चना मेरी, तुम्हीं हो साधना मेरी
प्यार के दीप जलते हैं, तुम्ही हो कामना मेरी
धरा से आसमां तक है यही विस्तार आशा का
तुम्हीं में मै समा जाऊँ, यही अराधना मेरी.


--समीर लाल 'समीर'

--हा हा!! कैसा रहा??
वाह समीर जी ! इसे तो हमने देखा और अब पढ़ भी लिया. बहुत खूब... हम आपके है शिष्य तो हम भी अपनी ही रचना जो आज ही पोस्ट की है यहाँ चटका देते हैं :)

नील गगन के नील बदन पर
चन्द्र आभा आ छाई !

ऐसी आभा देख गगन की
तारावलि मुस्काई !

नभ ने ऐसी शोभा पाई
सागर-मन अति भाई !

कहाँ से नभ ने सुषमा पाई
सोच धरा ने ली अँगड़ाई !

रवि की सवारी दूर से आई
उसकी भी दृष्टि थी ललचाई!

घन-तन पर लाली आ छाई
घनघोर घटाएँ भी सकुचाईं !

नील गगन के नील बदन पर
रवि आभा घिर आई !

ऐसी आभा देख गगन की
कुसुमावलि भी मुस्काई !

नील गगन के नील बदन पर
चन्द्र आभा आ छाई !

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