दरअसल ... पौराणिक और ऐतिहासिक धारावाहिक


-अजय ब्रह्मात्मज
    फिर से छोटे पर्दे पर ऐतिहासिक और पौराणिक चरित्रों की सक्रियता बढ़ी है। ‘महाराणा प्रताप’, ‘जोधा अकबर’, ‘बुद्ध’ और अब ‘महाभारत’ ़ ़ ़ एक-एक कर विभिन्न चैनलों से इनकी कहानियां नए रंग-रूप में आ रही हैं। पौराणिक, ऐतिहासिक और मिथकीय धारावाहिकों का दर्शक समूह है। इस विशिष्ट दर्शक समूह के अलावा हमेशा कुछ नए दर्शकों का झुंड भी ऐसे धारावाहिकों की ओर मुड़ता है। बताया जा रहा है कि पुराण, इतिहास और मिथक के चरित्र टीवी चैनलों के वर्तमान दर्शकों को भा रहे हैं। इनकी लोकप्रियता और दर्शकता सबूत है।
    मिथकीय धारावाहिकों में ‘देवों के देव महादेव’ सर्वाधिक लोकप्रिय है। इस लोकप्रियता के बावजूद कतिपय आलोचक मानते हैं कि उक्त धारावाहिक में मिथ्या नाटकीयता के वशीभूत होकर मिथक का उपयोग किया गया है। इस धारावाहिक में भी दर्शकता बटोरने पर ज्यादा जोर है। छोटे पर्दे पर दर्शकता का दबाव बना रहता है। इस दबाव में अनेक समझौते होते हैं। दरअसल,टीवी के दर्शक निष्क्रय किस्म के होते हैं। वे अपनी आपत्ति दर्ज नहीं करते। कई बार देखा गया है कि एक बार लोकप्रियता हासिल करने के बाद धारावाहकों से दर्शक बंध जाते हैं। उन्हें उम्मीद रहती है कि फिर से क्रिएटिव छलांग लगेगी और उनके मनोरंजन को पींग मिलेगा।
    पौराणिक और ऐतिहासिक धारावाहिकों में यह देखा जा सकता है कि हम उन विभूतियों और चरित्रों की ही कहानियां सुनना चाहते हैं, जो बचपन से इतिहास की किताबों से हमारे पठन-पाठन का हिस्सा रह। हम पाठ्यक्रम को ही दृश्य माध्यम में दोहराते रहते हैं। कभी यह कोशिश नहीं की जाती कि अन्य चरित्रों पर शोध कर उन पर काम किया जाए। मुगल काल की ही बात करें तो हमेशा अकबर की ही कहानी फिल्मों और टीवी शो में दोहरायी जाती है। बाबर से लेकर औरंगजेब तक की बादशाहत रही। उन पर भी तो कहानियां सोची जा सकती हैं। इन बादशाहों की बेगमें रही होंगी। बादशाहों की बहनों की प्रेमकहानियां रही होंगी। उनके भाई रहे होंगे। राजमहलों की अपनी राजनीति थी। हमारे निर्माता-निर्देशक इतिहास की अपरिचित विथिकाओं में जाने से डरते हैं। सबसे बड़ा डर टीआरपी का रहता है। उन्हें लगता है कि पहले से दर्शकों के मानस में विराजमान व्यक्ति त्वों की कहानियां सुनाई जाएं तो ही उनकी रुचि होगी। साहस कर किसी एक ने पहल कर दी तो बाद में सभी उसी व्यक्तित्व के पीछे लग जाते हैं। इसी भेड़चाल की वजह से कभी भगत सिंह पर छह फिल्में बन जाती हैं तो कभी क्रांतिकारियों की सुध तक नहीं रहती। मेरा मानना है कि भारतीय इतिहास के साम्राज्यों की कहानी सिलसिलेवार तरीके से दर्शकों के बीच परोसी जा सकती हैं। कमोबेश सभी को दर्शक मिलेंगे।
    एक और समस्या है। इन चरित्रों को रूप देने में हमारे निर्देशक और उनकी तकनीकी टीम प्रचलित ध्वनियों का ही इस्तेमाल करते हैं। प्रचलित छवियों से धारणाएं बन गई हैं। उन धारणाओं पर अमल हो रहा है। दादा साहेब फाल्के से लेकर आशुतोष गोवारीकर तक उन छवियोंं को तार्किक तरीके से बदलने की कोशिश नहीं करते। भारतीय संदर्भ में पहले राजा रवि वर्मा के कैलेंडर आर्ट का अनुकरण हुआ। कभी किसी ने लुक और रूप पर सवाल नहीं उठाया। इधर एक नई प्रवृत्ति दिख रही है। हम चरित्र तो भारतीय लेते हैं, लेकिन उनका चरित्रांकन हॉलीवुड की ऐतिहासिक फिल्मों के अनुसार करते हैं। उन्हें पेश करने में पश्चिमी सोच और कल्पना का सहारा लेते हैं। एकता कपूर के असफल ‘महाभारत’ में हम इसकी झलक देख चुके हैं। दूसरी तरफ डॉ ़ चंद्रप्रकाश द्विवेदी के ‘एक और महाभारत’ में प्रयोग किया गया तो उसे सभी का समर्थन नहीं मिला। इतिहास के एक समकालीन तर्क का अवसान हो गया।
    हाल ही में आरंभ हुए ‘बुद्ध’ और ‘महाभारत’ के बारे में विशेषज्ञ अभी मौन हैं। कुछ कडिय़ों के प्रसारण के बाद स्वरूप समझ में आने पर उनकी टिप्पणियां आएंगी। यों आरंभिक कडिय़ों के प्रसारण में ही निराशा के बीज पड़ गए हैं। उनका मानना है कि निश्चित ही तकनीक की सहायता से ये धारावाहिक भव्य, चुस्त और आकर्षक हो गए हैं, लेकिन आत्मा खो गई है। आत्मा से तात्पर्य धारावाहिकों के सार और विषय वस्तु से है। पुराने की याद और उसके श्रेष्ठता बोध को छोड़ भी दें तो भी यह कहा-सुना जा रहा है कि संवादों और संभाषण में प्रभाव नहीं है।
    देखना रोचक होगा कि आज के दर्शक इन धारावाहिकों को किस स्तर और रूप में अपनाते हैं?



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