हमनाम अमिताभ बच्चन का दंश



मेरा नाम भी अमिताभ बच्चन है। मेरा जन्म 24 अक्टूबर 1956 को बिहार के पोखरभिरा गांव में हुआ। मेरे पिता सीताराम लाल कर्ण ने अपने बच्चों का नाम थोड़ा साहित्यिक सा रखा। यानी प्रियंवदा, पारिजात, ज्योतसना और अमिताभ। घर में मुझे बच्चन पुकारा जाता था। मुझे बस इतना पता है कि सातवीं-आठवीं कक्षा में रहा होउंगा, जब स्कूल में मेरा नाम अमिताभ दर्ज कराया गया। इंटर में आया तो पता चला कि हरिवंश राय बच्चन के बेटे का नाम भी यही है। घर वाले इस संयोग से खुश हुए। परिवार के सुसंस्कृत होने का जैसे प्रमाण मिला हो। जल्द ही ये नाम मुझे बोझ लगने लगा। उधर अमिताभ बच्चन बाजार के ब्रांड नेम बन रहे थे और इधर मेरी शर्मिंदगी बढ़ रही थी। 1974 में संभवत: मेडिकल का एंट्रेस देने पटना आया था। पीएमसीएच में एडमिट लेने गया। जोर शोर से मेरा पुकारा नाम पुकारा गया तो फजीहत हो गई। भीड़ से गुजरते हुए काउंटर तक पहुंचना नर्क से गुजरने जैसा अनुभव था। नकलची बंदर होने का एहसास नसों में बिजली की तरह दौड़ा। एक नाचीज पर किसी की लोकप्रियता इतनी भारी पड़ सकती है, इसका बड़ा खट्टा एहसास हुआ। इसे कभी नोच कर फेंक नहीं सका।
न जाने नाम बदलने का कानूनी प्रयास क्यों नहीं किया? शायद इससे थोड़ी राहत मिलती। मगर दुर्घटना तो हो चुकी थी। नासूर बन गया था। पहचान के संकट से उबरने के लिए कई नामों से लिखता रहा। कभी अमित सिन्हा कभी सिर्फ अमिताभ। बायोडाटा में नाम नहीं बदल सकता था। नौकरियां इसी नाम से करनी पड़ी। बैंक वाले देखते ही कहते अमिताभ बच्चन आ गए। अब तो खैर बैंकों में भी अपना नाम सिर्फ अमिताभ ही रखता हूं। पत्र-पत्रिकाओं के संपर्कों से आग्रह किया करती कि मेरा नाम सिर्फ अमिताभ ही जाने दे। रिक्वेस्ट मान लेने में उन्होंने अपनी भलाई समझी। मैंने अमिताभ बच्चन का कोई हमशक्ल नहीं। 5 फीट 6 इंच का दुबला पतला मौर्य टीवी पटना में काम करता हूं। अपने निर्देशक मनीष झा के लिए मैं बिग बी नहीं एबी हूं। कभी कभी सोचता हूं कि अमिताभ बच्चन इतना पॉपुलर, बाजारू नाम नहीं होता, वह विज्ञापनों में नहीं आते और उनका सिनेमा भी उच्च होता है। टिकाऊ और सारगर्भित और कुछ युगांतकारी तो इस संयोग कि टीस शायद काम होती। मैं सोचता हूं कि आज या कल मैंने अगर कुछ बढिय़ा और गंभीर सा काम किया(जिसकी अब बहुत उम्मीद नहीं)तो वह काम निस्संदेह अमिताभ बच्चन नहीं ही करूंगा। नाम के इस लफड़े को छोड़ दे तो दुख होता है कि मेरी और बिग बी भी सारी जिंदगी बाजार की सेवा में निकल गई। वह मशहूर हो कर भी कुछ नहीं कर पाए और मैं अपनी गुमनामी में बाजारू पत्रकारिता का छोटा सा सेवक बन कर रह गया।
(अमिताभ बच्चन अमिताभ नाम से अभी मौर्या टीवी,पटना में कार्यरत हैं।)
यह लेख पिछले साल लिखा गया था।


Comments

aamirpasha said…
कुछ इसी तरह नाम के ऊपर एक टीस सी दिखाई गई फिल्म खोसला का घोसला जहाँ तक मुझे याद है लीड रोल कर रहे अनुपम खेर के बेटे का नाम चिरोंजी रहता है. फिल्मों को समाज और समाज को फिल्मों में आना एक गहरा सम्बन्ध है. अक्सर मेरे नाम आमिर का लोग तलफ्फुज नही कर पाते तो बताना पड़ता है जनाब आमिर खान वाला आमिर है बस बाद में पाशा लगा है. अच्छा बादशाह .. अरे नही भाई पाशा मुस्तुफा कमाल पाशा वाला पाशा. आपका ये पोस्ट कबीले तारीफ.

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