हिट और फ्लॉप का समीकरण

चवन्नी कुछ ऐसी बातें बताना चाहता है ,जिसके बारे में आप सभी जानना चाहते होंगे.अब जैसे हिट और फ्लॉप की ही बात करें.कई बार आपको ताज्जुब होता होगा कि अरे यार यह फिल्म तो कोई खास नही चली थी,फिर हिट कैसे हो गयी.इसी तरह कई बार आप खुद से ही पूछते होंगे कि फलां फिल्म तो हमारे इलाक़े में खूब चली ,लेकिन फ्लॉप कैसे हो गयी.तो हिट और फ्लॉप का पूरा लम्बा-चौड़ा खेल है.इस खेल में फिल्म स्टार,निर्माता-निर्देशक,वितरक,प्रदर्शक और चवन्नी छाप दर्शक भी शामिल रहते हैं.यह घलात्फह्मी दिल-ओ-दिमाग से निकल दीजिए कि केवल दर्शक ही किसी फिल्म के भाग्य का फैसला करते हैं.अरे हाँ,मीडिया का भी रोल होता है.आजकल एक पोपुलर हीरो और प्रोड्यूसर मीडिया के लोगों को धन्यवाद पत्र के साथ उपहार भी भिजवा रहे हैं,क्योंकि मीडिया बिरादरी उनके प्रति उदार रही है.यहाँ स्पष्ट हो लें कि फिल्म बिरादरी के लिए मीडिया का मतलब इंग्लिश प्रेस और एल्क्ट्रोनिक मीडिया होता है.इसमें हिन्दी या अन्य भाषायी प्रेस शामिल नही हैं।

हिट और फ्लॉप

हिट और फ्लॉप फिल्मों के बारे में सोचते और सुनते ही हमें लगता है कि किसी फिल्म को ज्यादा से ज्यादा दर्शकों ने देखा होगा तभी वह हिट हुई होगी या नही देखा होगा तो फ्लॉप हो गयी होगी.यह आंशिक सत्य है.दर्शकों की संख्या फिल्म के हिट और फ्लॉप के लिए मणि रखती है,लेकिन एक लेवल के बाद इस गिनती का कोई अर्थ नही रह जाता.हिट और फ्लॉप में पुतलियों की नही पैसों कि गिनती होती है.किस फिल्म से कितने पैसों की कमी हुई.असल फैसला यहाँ से होता है.आपके मन में सवाल कुलबुला रहा है कि जिस फिल्म को जयादा दर्शक देखेंगे वही तो हिट होगी.ऊपरी तौर पर आपका तर्क सही है,लेकिन सिनेमा के बिजनेश में यह तर्क काम नही करता.कैसे?

पैसे और पुतलियाँ

हिन्दी सिनेमा के हिट और फ्लॉप में उत्तर भारत के ग़रीब दर्शकों की नियामक भूमिका नही रह गयी है.पहेलियाँ न बुझाते हुए चवन्नी सीधे तथ्यों पर आता है। ओम शांति ओम की बात करें.यह फिल्म एक साथ पूरी दुनिया में रिलीज हुई.न्यूयॉर्क से लेकर नवादा और लंदन से लेकर लखनऊ तक के सिनेमाघरों में लगी.देश के महानगरों के मल्टीप्लेक्स में भी लगी.अब पहले शो से गिनती शुरू होती है.गिनती दर्शकों की नही पासों की होती है.न्यूयॉर्क,लंदन,मुम्बई,दिल्ली ,नवादा,जौनपुर,बसंतपुर...इन सभी शहरों के सिनेमाघरों के टिकेट अलग-अलग कीमत के होते हैं.न्यूयॉर्क में 15 डॉलर,लंदन में 7 पौंड ,मुम्बई में ३५० रुपये ,दिल्ली में ३०० रुपये,नवादा,जौनपुर और बसंतपुर में १५ से २५ रुपये...लगभग इन कीमतों में टिकेट खरीद कर विभीन्न शहरों के दर्शक सिनेमा देखते हैं.अब अगर न्यूयॉर्क १०० दर्शक फिल्म देखेंगे तो १५०० डॉलर मिलेंगे,मुम्बई के १०० दर्शक ३५,००० रुपये दे जायेंगे,लेकिन नवादा,जौनपुर और बसंतपुर के सिनेमाघरों से ३५,००० जमा करने में कितने दर्शकों की ज़रूरत पड़ेगी.इन छोटे शहरों के १०० दर्शक केवल २५०० रुपये ही दे पायेंगे.चवन्नी यहाँ न्यूयॉर्क और लंदन की कमाई को रुपयों में नही बदल रहा है। सामान्य तौर पर छोटे शहरों के १५०० से २००० दर्शक किसी फिल्म को देखेंगे तभी ३५,००० की कमाई हो पायेगी।

अब चूंकि हिट और फ्लॉप के लिए कमाई ही महत्वपूर्ण है,इसलिए शहरों के दर्शकों का छोटा हिस्सा भी फिल्म को हिट कर देता है,जबकि देश के छोटे शहरों और कस्बों के अधिकांश दर्शकों की पसंद निर्माताओं के पल्ले ही नही पड़ती ।

बाकी बातें अगली बार.क्या यह जानकारी रोचक लगी.आपकी टिप्पणियां और राय ही चवन्नी का मार्गदर्शन करती हैं.

Comments

Anonymous said…
जानकारी मजेदार थी. अगर यह जानकारी एक ही पोस्ट में खत्म कर देते तो अच्छा होता. जानकारी बढाने के लिए शुक्रिया.
Ankit Mathur said…
जानकारी अच्छी है, बहुत से लोग इसके
बारे में शायद पहले से ही जानते हैं, कम से
कम मुझे तो इस बात की जानकारी थी।
चवन्नी ने सरलीकृत रूप में लिख कर
उन लोगो के लिये इस गणित को आसान
कर दिया जो कि हिट और फ़्लाप की
पहेली में उलझ जाते है और अपनी पसंद और
नापसंदगी के साथ हिट और फ़्लाप को जोड
कर देखते हैं।
कहने की आवश्यकता नही कि आज के इस
दौर में मीडिया हिट और फ़्लाप बनाने में
निर्णायक भूमिका निभा(ता),सकता है।

धन्यवाद...
अंकित माथुर...

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