फ़िल्म समीक्षा:जुगाड़

-अजय ब्रह्मात्मज

निर्माता संदीप कपूर ने चाहा होगा कि उनकी जिंदगी के प्रसंग को फिल्म का रूप देकर सच, नैतिकता और समाज में प्रचलित हो रहे जुगाड़ को मिलाकर दर्शकों को मनोरंजन के साथ संदेश दिया जाए। जुगाड़ देखते हुए निर्माता की यह मंशा झलकती है। उन्होंने एक्टर भी सही चुने हैं। सिर्फ लेखक और निर्देशक चुनने में उनसे चूक हो गई। इरादे और प्रस्तुति के बीच चुस्त स्क्रिप्ट की जरूरत पड़ती है। उसी से फिल्म का ढांचा तैयार होता है। ढांचा कमजोर हो तो रंग-रोगन भी टिक नहीं पाते।
जुगाड़ दिल्ली की सीलिंग की घटनाओं से प्रेरित है। संदीप कपूर की एक विज्ञापन कंपनी है,जो बस ऊंची छलांग लगाने वाली है। सुबह होने के पहले विज्ञापन कंपनी के आफिस पर सीलिंग नियमों के तहत ताला लग जाता है। अचानक विज्ञापन कंपनी सड़क पर आ जाती हैं और फिर अस्तित्व रक्षा के लिए जुगाड़ आरंभ होता है। इस प्रक्रिया में दिल्ली के मिजाज, नौकरशाही और बाकी प्रपंच की झलकियां दिखती है। विज्ञापन कंपनी के मालिक संदीप और उनके दोस्त आखिरकार सच की वजह से जीत जाते हैं।
रोजमर्रा की समस्याओं को लेकर रोचक, व्यंग्यात्मक और मनोरंजक फिल्में बन सकती हैं। जुगाड़ में भी संभावना थी, लेकिन लेखक और निर्देशक ने ज्यादा रिसर्च नहीं किया। सिर्फ एक विचार को लेकर वे फिल्म बनाने निकल पड़े। इस विचार का ताना-बाना इतना कमजोर है कि समर्थ अभिनेताओं के बावजूद कहानी चारों खाने चित्त हो जाती है। दृश्यों की परिकल्पना सुसंगत नहीं है। संवादों में दोहराव है। एक प्रसंग में फिल्म का नायक पांच पंक्तियों में तीन बार जरूरत शब्द का बेजरूरत इस्तेमाल करता है। संवाद सपाट हों तो दृश्य में निहित भाव प्रभाव नहीं पैदा कर पाते। आश्चर्य होता है कि मनोज बाजपेयी जैसे सशक्त और समर्थ अभिनेता फिल्में चुनने में ऐसी गलती कैसे कर रहे हैं। अपनी संजीदगी और प्रतिभा के दम पर वे किसी कमजोर और ढीली फिल्म से दर्शकों को नहीं बांध सकते। इस फिल्म में मनोज बाजपेयी के साथ विजय राज, गोविंद नामदेव और संजय मिश्र जैसे अभिनेता भी थे, लेकिन निर्देशक ने किसी का उचित उपयोग नहीं किया है। जुगाड़ अच्छे इरादों को लेकर बनी साधारण फिल्म है।

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देखी नही सर जी...देखने के बाद कहूंगा

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