फिल्‍म समीक्षा : ओ तेरी

फिल्म रिव्यू
रोचक विषय का मखौल
ओ तेरी
-अजय ब्रह्मात्मज
    उमेश बिष्ट की ‘ओ तेरी’ देखते हुए कुंदन शाह निर्देशित ‘जाने भी दो यारो’ की याद आ जाना स्वाभाविक है। उसी फिल्म की तरह यहां भी दो बेरोजगार युवक हैं। वे नौकरी और नाम के लिए हर यत्न-प्रयत्न में विफल होते रहते हैं। अखबार की संपादिका अब चैनल की हेड हो गई है। ‘ओ तेरी’ में भी एक पुल टूटता है और एक लाश के साथ दोनों प्रमुख किरदारों की मुश्किलें बढ़ती हैं।
    अगर ‘ओ तेरी’ आज के सामाजिक माहौल की विसंगतियों को ‘जाने भी दो यारो’ की चौथाई चतुराई और तीक्ष्णता से भी पकड़ती तो 21 वीं सदी की अच्छी ब्लैक कामेडी हो जाती। लेखक-निर्देशक इस अवसर का इस्तेमाल नहीं कर पाते। उन्होंने अपनी कोशिश में ‘जाने भी दो यारो’ का मखौल उड़ाया है। फिल्म के प्रमुख किरदारों में पुरानी फिल्म जैसी मासूमियत नहीं है, इसलिए उनके साथ हुए छल से हम द्रवित नहीं होते। जरूरी नहीं है कि वे दूध के धूले हों लेकिन उनके अप्रोच और व्यवहार में ईमानदारी तो होनी ही चाहिए।
    पुलकित सम्राट और बिलाल अमरोही दोनों प्रमुख किरदारों को जीने और पर्दे पर उतारने की कोशिश में असफल रहे हैं। समस्या उनकी एक्टिंग से अधिक उनके चरित्रों की है। अगर चरित्र सुगठित नहीं हो तो होनहार और प्रतिभाशाली एक्टर भी कोई प्रभाव नहीं दिखा पाते। ‘ओ तेरी’ के साथ यही हुआ है। किरदारों के नाम पर गढ़े गए कैरिकेचर की भूमिकाओं में अनुपम खेर, मुरली शर्मा और मंदिरा फिल्म का असर हल्का करते हैं। अन्य किरदारों के साथ भी यही दिक्कत रही है।
    ‘ओ तेरी’ एक रोचक विषय पर बनी अधकचरी फिल्म है।
अवधि- 107 मिनट

* एक स्टार

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