दरअसल : हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का विकेंद्रीकरण



-अजय ब्रह्मात्मज

पिछले दिनों पटना में आयोजित लिटरेचर फेस्टिवल में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री(बॉलीवुड) के विकेंद्रीकरण पर बातें हुईं। सुधीर मिश्र, तिग्मांशु धूलिया और पीयूष झा ने अपने अनुभवों को साझा किया। इस विमर्श में मुझे भी कुछ बोलने और समझने का मौका मिला। फिल्म पत्रकारिता के अपने अनुभवों और फिल्म बिरादरी के सदस्यों से हुई निरंतर मुलाकातों के आधार पर मेरी दृढ़ धारणा है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री शातिर तरीके से बंटी हुई है। इंडस्ट्री की स्थापित हस्तियां हमेशा वकालत करती हैं कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री एक बड़ा परिवार है, जिसमें सारे सदस्य समान हैं। कोई भेदभाव नहीं बरता जाता। सभी को बराबर मौके मिलते हैं। यह बात सुनने में अच्छी लगती है। ऊपरी तौर पर यह सच भी लगता है, लेकिन कभी भी सतह को हिला कर देखें तो अंदर विभाजन की कई दीवारें नजर आती हैं। यह विभाजन धर्म, जाति(नेशन), इलाका, प्रदेश और भाषा से निर्धारित है। क्या वजह है कि पिछले सौ सालों में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में हिंदी प्रदेशों के नायक और नायिकाओं का प्रतिशत गौण है।
    आजादी के बाद हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के तीन प्रमुख निर्माण केंद्रों में से लाहौर और कोलकाता में हिंदी फिल्मों का निर्माण लगभग बंद हो गया। मुंबई अकेले निर्माण केंद्र के तौर पर मजबूत हुआ। कोलकाता(बंगाल) और लाहौर(पंजाब) से लेखक, निर्देशक, संगीतकार, तकनीशियन और कलाकारों ने मुंबई को अपना ठिकाना बनाया। पांचवें दशक के उत्तरार्ध से लेकर छठे दशक के अंत तक प्रतिभाओं का आना जारी रहा। इन प्रतिभाओं के प्रयास का समेकित प्रभाव हिंदी फिल्मों की विविधता में नजर आता है। इसी विविधता को इतिहास में स्वर्ण युग के नाम से दर्ज किया जाता है। सातवें दशक में यह प्रभाव बना रहता है। तब तक बाहर से आई प्रतिभाएं मुंबई में जड़ें जमा लेती हैं। इनका वर्चस्व बढ़ता है। धीरे-धीरे यही वर्चस्व जड़ता में तब्दील होता है। और फिर हम देखते हैं कि आने वाले दशकों में हिंदी फिल्में बेहतर से साधारण और फिर घटिया रूप में चलती रहती हैं। गौर करें तो यह अघोषित विकेंद्रीकरण का ही असर था। बाद में केंद्रीकरण के साथ मुंबई से उत्पादित फिल्मों की गुणवत्ता गिरती गई।
    हिंदी फिल्मों में आई यह जड़ता आर्थिक उदारीकरण के प्रभाव में फिल्म इंडस्ट्री की पैदाइश फिल्मकारों सूरज बडज़ात्या, आदित्य चोपड़ा और करण जौहर के प्रयास से एक विक्षेप लेती है। हिंदी सिनेमा अपनी जमीन को छोड़ विदेशों से प्रेरित और प्रभावित होने लगता है। एनआरआई या डॉलर सिनेमा के रूप में यह आप्रवासी भारतीयों और विदेशों में बसे भारतवंशियों के मनोरंजन का विषय बन जाता है। हालांकि इससे भरपूर कमाई होती है और यह भ्रम भी होता है कि हिंदी फिल्मों का वैश्विक विस्तार हो रहा है, लेकिन दस साल के अंदर ही इसकी सीमाएं जाहिर होने लगती हैं। इस दौर में हिंदी सिनेमा अपने पारंपरिक दर्शकों को सिनेमाघरों से विस्थापित कर देता है। कथित मल्टीप्लेक्स संस्कृति इस विस्थापन को महानगरों में और गहरा करती है। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के इस बेपरवाही से हिंदी प्रदेशों की एक भाषा भोजपुरी को फायदा होता है। जीर्ण पड़ी भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री हरी हो जाती है।
    इस पृष्ठभूमि में सन् 2000 के बाद फिल्म इंडस्ट्री के बाहर से आए युवा फिल्मकारों की कोशिशों से हिंदी फिल्मों के कंटेंट और  प्रजेंटेशन में स्पष्ट फर्क दिखने लगता है। पिछले 15 सालों में हिंदी प्रदेशों के विभिन्न छोटे, मझोले और बड़े शहरों से आए इन फिल्मकारों ने हिंदी फिल्मों का परिदृश्य बदल दिया है। अभी पांच श्रेष्ठ, चर्चित या अधिक कमाई की सूची बनाएं तो कम से कम इनमें से तीन फिल्मों के लेखक, निर्देशक और कलाकार फिल्म इंडस्ट्री के बाहर से आए हुए मिलेंगे। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के मुंबइया किले में जैसे-तैसे प्रवेश कर इन प्रतिभाओं ने हलचल मचा दी है। दरअसल, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में आंतरिक विकेंद्रीकरण हो चुका है। बाहर से आई प्रतिभाओं ने इंडस्ट्री की स्थापित प्रतिभाओं का वर्चस्व तोड़ दिया है। अब जरूरत है कि ये प्रतिभाएं हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बाह्य विकेंद्रीकरण पर समय और ध्यान दें। अगर ये प्रतिभाएं अपने मूल इलाकों में जाकर फिल्म निर्माण के वर्कशॉप और मेंटरिंग करें तो स्थानीय स्तर पर अंकुरित हो रही अनेक प्रतिभाओं को दिशा और जमीन मिल सकती है। हिंदी प्रदेशों की राज्य सरकारों की मदद से सभी राजधानियों में स्थानीय प्रतिभाओं को जोडक़र छोटे फिल्म निर्माण केंद्र बनाए जा सकते हैं।

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सच कहा आपने, विकेन्द्रीकरण अत्यावश्यक है, कई लाभ हैं इसके।

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