किरदार में डूब कर मिलती है कामयाबी : विद्या


सशक्त अभिनेत्रियों की फेहरिस्त में विद्या बालन अग्रिम कतार में आती हैं। उनकी हालिया फिल्म ‘शादी के साइड इफेक्ट्स’ बॉक्स ऑफिस चमक बिखेर नहीं सकी, मगर वे जल्द ‘बॉबी जासूस’ से वापसी करने की तैयारी में हैं। उनके करियर को रवानगी प्रदान करने में ‘कहानी’ और ‘द डर्टी पिक्चर’ की अहम भूमिका रही है। अदाकारी को लेकर उनका अप्रोच जरा हटके है। वे साझा कर रही हैं अपनी कार्यप्रणाली
    मैं किरदार की आत्मा में उतरने के लिए आमतौर पर स्क्रिप्ट को बड़े ध्यान से सुनती और पढ़ती हूं। मैं किरदार की अपनी पृष्ठभूमि तैयार करती हूं। अक्सर किरदार से प्यार करने लग जाती हूं और फिर उसे पोट्रे करती हूं। उस लिहाज से मेरे करियर में ‘कहानी’ सबसे चुनौतीपूर्ण फिल्म रही है। विद्या बागची को मुझे कैसे पेश करना है, वह मेरी समझ में परे था। सुजॉय घोष ने भी मुझे पूरी स्क्रिप्ट नहीं सुनाई थी। उन्होंने मुझे बस उसकी एक लाइन सुनाई। उसके आगे विद्या बागची के किरदार की कहानी बस कहानी थी। उसका एक फायदा यह हुआ कि मैं विद्या बागची के चेहरे पर असमंजस भाव लगातार कायम रख सकी। मैं उसे परफॉरमेंस नहीं कहूंगी। मैंने उस किरदार को जिया। उसे निभाने के लिए मैं बतौर विद्या बालन कुछ सोच ही नहीं सकी।
    मेरे ख्याल से उस किरदार के साथ दर्शकों की भी यात्रा चल रही थी। मिस्ट्री आखिरी समय तक बरकरार रही। विद्या बागची की मासूमियत, ईमानदारी और साथ ही दगाबाजी साथ-साथ चली। दर्शक एम्यूज्ड रहे। मैं खुद शूट से पहले और शूट के दरम्यान भी सुजॉय से पूछती रही कि अब आगे क्या? वे मगर बड़ी चालाकी से इधर-उधर की बातें कर मुझे कुछ भी नहीं बताते। शूट के दौरान का एक मजेदार वाकया आप से साझा करना चाहूंगी। विद्या बागची और राणा जब मॉर्चरी हाउस से बाहर निकलते हैं तो राणा विद्या से पूछता है, ‘आप के पति का कोई रिश्तेदार’। विद्या बागची जवाब देती है, ‘चाचा’। बस अब वह चाचा क्यों बोलती है, उसका मोटिव क्या है, मैं व्यक्तिगत तौर पर कुछ समझ नहीं सकी थी। फिल्म देखने के बाद आप सबों की तरह मैं भी समझ सकी कि वह आखिर में क्या कहानी बना रही थी? सुजॉय की वह स्टाइल ऑफ वर्किंग कमाल की थी। उन्होंने मुझे संशय में नहीं रखा होता तो शायद ही विद्या बागची को जी पाई होती।
    अदाकारी की बारीकियां सीखने का सबका अपना तरीका है। अगर आप कहीं से प्रशिक्षण हासिल कर पाते हैं तो बहुत अच्छी बात है। मेरे मामले में वैसा नहीं हो सका था। मेरे संग ऑन द जॉब ट्रेनिंग वाला माजरा था। मैंने मगर पाया है कि किसी भी काम में सिद्धहस्त होने के लिए जिज्ञासु होना, चीजों को महसूस करना और अपने आंख-कान खुले रखना बहुत जरूरी है। मैंने उन चीजों पर हमेशा अमल किया। वह आगे भी कायम रहेगा। एक अच्छी चीज यह रही कि मेरी शुरुआत टीवी फिर मॉडलिंग से हुई। बाद में विज्ञापन फिल्में भी कीं। आखिर में फीचर फिल्मों की ओर मुड़ी। तो मेरा क्रमिक विकास होता रहा। मेरा मानना है कि अगर आप का दिमाग जो चीज कनसीव कर सकता है, उसे अचीव भी करेगा। फिल्मों में मेरे संघर्ष के बारे में हर किसी को पता है। वह काफी लंबा चला था मैं चेंबूर में अपने घर के पास की मंदिर की चौखट पर बिलख-बिलख कर रोई, मगर मेरे परिजनों के अपार सपोर्ट से मेरा मनोबल कायम हुआ। आज मैं इस मुकाम पर हूं।
    मेरा मानना है कि एक अदाकार को बेबाक, बिंदास होना चाहिए। शर्म के पर्दे उस वक्त हटा देने चाहिए, जब सामने मिलन लूथरिया जैसा फिल्मकार हो। आप उन जैसों पर आंखें मूंद कर भरोसा कर सकते हैं। मैं भी शुरू में हालांकि वैसी बेबाक नहीं थी। मुझे याद है ‘परिणीता’ से पहले भी मुझे एक फिल्म ऑफर हुई थी, जिसे मैंने छोटे कपड़े पहनने की अनिवार्यता के चलते ठुकरा दिया था। वहां मगर संबंधित फिल्मकार का मकसद मेरी सेंसुएलिटी को भुनाना था, जो मैं समझ चुकी थी। आप ‘बैंडिट क्वीन’ और ‘डाकू हसीना’ की बोल्डनेस के अंतर को आसानी से समझ सकते हैं। बहरहाल ‘द डर्टी पिक्चर’ में सिल्क की आउटफिट और बॉडी लैंग्वेज को पेश करना मेरे लिए आसान नहीं था। शूट की शुरूआत में मुझमें हिचकिचाहट थी। धीरे-धीरे जब सिल्क की असल जिंदगी के बारे में जाना। उसके बिंदास रवैये को समझा तो मुझमें स्वाभाविक तब्दीली आने लगी। मैंने अपने अंदर की हिचकिचाहट को खत्म किया। सेट पर छोटे कपड़ों में स्वाभाविक तरीके से रहने लगी। सिल्क के अवतार में मुझे मोटी दिखना था। एकबार मेरा वजन कम हुआ तो उसका असर मेरी तोंद पर दिखने लगा था। मिलन के लिए वह चिंता का विषय था। मैं उसी वक्त कैमरे के पीछे गई। अपने पेट के टायरों को बाहर निकाला। कपड़ों को टाइट किया और जब मिलन ने देखा तो वे अवाक थे। उनके सामने वही पुरानी सिल्क थी। आमतौर पर किरदार के गेटअप में उतरना हो तो अपनी फिजिक के साथ भी महीनों प्रयोग करना पड़ता है। आमिर ने वैसा ‘मंगल पांडे’ और ‘गजनी’ के लिए किया था तो फरहान ने अपनी फिजिक पर वैसा काम ‘भाग मिल्खा भाग’ के लिए किया। नतीजा सबके सामने है।
    बॉक्स
भाषा पर मेहनत करती हैं विद्या : सलीम आरिफ
    विद्या की सीखने की जिजीविषा की तारीफ दिग्गज थिएटर आर्टिस्ट सलीम आरिफ भी करते हैं। वे बताते हैं, ‘विद्या के मैनेजर ने एकबारगी मुझे फोन किया। मुझसे कहा कि विद्या आपसे मिलना चाहती हैं। मैंने सवाल किया, क्यों? जवाब चला कि विद्या पाकिस्तान में एक कहानी पाठ करना चाहती हैं। वे चाहती हैं कि उनका उर्दू का उच्चारण परफेक्ट रहे। मैं वह सुन अवाक रह गया। आज की तारीख में अधिकांश से यही सुनने को मिलता है कि सर मैंने एक्टिंग का कोर्स कर लिया। अब जिम ज्वॉइन कर रहा हूं। अगले दो-तीन महीनों में मैदान में उतरने वाला हूं। किसी के मुंह से यह सुनने को नहीं मिला कि अपनी भाषा पर मेहनत करने वाला हूं या करने वाली हूं। विद्या वैसी नहीं हैं, तभी अलग हैं।’
-अमित कर्ण

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (30-06-2014) को "सबसे बड़ी गुत्थी है इंसानी दिमाग " (चर्चा मंच 1660) पर भी होगी।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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