नई पीढ़ी की फिल्‍म है 'फगली'



-अजय ब्रह्मात्मज
    निश्चित ही फिल्म का टायटल थोड़ा अजीब सा है। मेरे एक दोस्त ने स्क्रिप्ट पढऩे के बाद कहा था कि तेरी स्क्रिप्ट ‘फगली’ सी है। फिल्म के नाम को लेकर हम जूझ ही रहे थे। मुझे यही नाम अच्छा लगा। फिल्म के एक गाने में हमने बता दिया है कि हमें क्या-क्या ‘फगली’ लगता है। इस नाम में आए एफ के साथ जो शब्द बना लें और उसके साथ ‘अगली’  जोड़ दें। इस फिल्म को देखने के बाद आप एक इंप्रेसन के साथ सिनेमाघर से निकलेंगे। फिल्म का रफ कट देखने के बाद किसी ने कहा कि ‘रंग दे बसंती’ जहां खत्म होती है, वहां से यह फिल्म शुरू होती है। इस फिल्म में हम सिर्फ मसला ही नहीं बता रहे हैं। हम उसका हल भी बता रहे हैं।
    यह चार किरदारों देव, गौरव, आदित्य और डायन की कहानी है। चारों दोस्त हैं। कालेज से निकले हैं। जिंदगी में प्रवेश करने वाले हैं। कालेज निकलते समय हम सभी के पास सपने होते हैं। चारों दोस्त दिल्ली की गंदगी से बचे हुए हैं। अमीर बनने की जल्दबाजी में नहीं हैं वे। ड्रग्स में नहीं है। उन्होंने अपनी सीमा रेखा तय कर ली है। वे महात्मा भी नहीं हैं। पार्टी-पिकनिक भी करते रहते हैं। इनका सामना एक पुलिस इंस्पेक्टर से होता है, जिसे रूलबुक जुबानी याद है। इस भिड़ंत के बाद उनकी जिंदगी कैसे बदलती है? पहले तो वे सही तरीके अपनाते हैं, लेकिन फंसते चले जाने के बाद उन्हें एहसास होता है कि वास्तव में उनक लड़ाई पूरे सेटअप और सिस्टम से है। यही हमारी फिल्म है। देश के आम युवक मुश्किल स्थिति में फंसने पर कैसे हीरो बन जाते हैं और बदलाव की वजह बनते हैं।
    इस फिल्म में दिल्ली दिखाई पड़ेगी। पिछले पंद्रह-बीस साल के आंदोलनों-अभियानों की झलक मिलेगी। मैं खुद मंडल कमीशन के आंदोलन में शामिल था। दिल्लीवासी थोड़े राजनीतिक हैं। यह राजधानी होने का असर हो सकता है। मेरे किरदारों को सही-गलत मालूम है। वे स्टैंड लेते हैं। दिल्ली तो महिलाओं की छेड़खानी की भी राष्ट्रीय राजधानी है। मेरे किरदार ऐसे मामले में भिड़ जाते हैं। वे हर मामले में अपनी राय रखते हैं।
    मैं स्वयं राजनीतिक का व्यक्ति हूं। देश के विभिन्न मसलों पर अपनी राय रखता हूं। नेता और नौकरशाह का नेक्सस काम करता है प्रशासन में। फिल्म का विचार इसी नेक्सस की तलाश से आया। आज के युवकों का तौर-तरीका बदल गया है। वे जागरुक हैं। वे पहले की तरह जोश में अंधे नहीं होते। युवकों की मुश्किलों और चुनौतियों को लेकर पहले भी फिल्में बनी हैं, जिनमें हमने सनी देओल और नाना पाटेकर की फिल्में याद हैं। यह आज के युवकों की फिल्म है।
    डिंपल (कपाडिय़ा) जी की वजह से अक्षय कुमार से मेरी मुलाकात हुई। मैं उनसे अपनी हर फिल्म शेयर करता हूं। उन्होंने अक्षय से मिलने की सलाह दी। ‘फगली’ का आयडिया उन्हें पसंद आया। उनके जुडऩे से फिल्म की चर्चा ज्यादा हा गई। इस फिल्म को देखने लोग जाएंगे। मेरी पिछली फिल्म को चार-चार स्टार मिले, लेकिन कोई देखने नहीं गया। फिल्म अच्छा बिजनेस नहीं कर सकी। इस बार ऐसी मुश्किल नहीं होगी। अक्षय की सलाह थी कि फिल्म को रिच करो और इसे ज्यादा दर्शकों तक ले जाओ। फिल्म का डार्क ट्रीटमेंट मत रखो। उनके साथ जुडऩे से थोड़ा-बहुत बदलाव करना पड़ा, लेकिन मूल कहानी और भाव वही रहा।
    कलाकारों के चुनाव में सावधानी रही। जिम्मी शेरगिल बहुत पुराने दोस्त हैं। जिम्मी को स्क्रिप्ट अच्छी लगी थी। उनसे इंस्पेक्टर के रोल के लिए कलाकारों के नाम पर बात चली तो मैंने उनका ही नाम सुझाया। वे पहले चौंके और फिर राजी हो गए। मेरे भरोसे को उन्होंने माना। फिल्म लिखते समय भी उनका ही खयाल था। विजेन्द्र सिंह से पुरानी जान-पहचान रही है। मुझे मालूम था कि वे एक्टिंग में आना चाहते हैं। ऑडिशन में वे फिल्म के किरदार के उपयुक्त लगे। मोहित मारवा की कास्टिंग अलग किस्म से हुई। तब मुझे नहीं मालूम था कि वे अनिल कपूर के संबंधी हैं। किनारा आडवाणी की सलाह दो जगहों से मिली थी। उन्हें ब्रीफ भेजकर ऑफिस बुलाया तो वह मेरे किरदार के रूप में मिलने आईं। मेरे खयाल से किनारा स्टार हैं। आरसी मेरा पुराना दोस्त है। इस बार उसके लायक किरदार मिल गया तो चुन लिया।
    ‘फगली’ आज के यूथ की एंटरटेनिंग फिल्म है, जिसमें कुछ ठोस बातें भी की गई हैं।

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