'आग' से जख्मी हुए रामू

अजय ब्रह्मात्मज
रामगोपाल वर्मा ने आगे बढ़कर 'शोले' को फिर से बनाने का जोखिम लिया था। इस जोखिम में वह चूक गए हैं। 'शोले' इस देश की बहुदर्शित फिल्म है। इसके संवाद, दृश्य और पात्र हमारी लोकरुचि का हिस्सा बन चुके हैं। लगभग हर उम्र के दर्शकों ने इसे बार-बार देखा है। यह फिल्म रामू को भी अत्यंत प्रिय है। रामू तो पूरे खम के साथ कह चुके हैं कि 'शोले' नहीं बनी होती तो मैं फिल्मकार नहीं बन पाता। बहरहाल, घटनाएं और संवेदनाएं 'शोले' की हैं, सिर्फ परिवेश और पात्र बदल गए हैं। कहानी रामगढ़ की जगह कालीगंज की हो गई है। यह मुंबई के पास की टापूनुमा बस्ती है, जहां ज्यादातर मछुआरे रहते हैं। खूंखार अपराधी बब्बन की निगाह इस बस्ती पर लगी है। इंस्पेक्टर नरसिम्हा से उसकी पुरानी दुश्मनी है। नरसिम्हा को भी बब्बन से बदला लेना है। वह हीरू और राज को ले आता है। ये दोनों छोटे-मोटे अपराधी हैं। जो नासिक से मुंबई आए हैं रोजगार की तलाश में ़ ़ ़ बसंती यहां घुंघरू बन गई है और तांगे की जगह ऑटो चलाती है तो राधा का बदलाव दुर्गा में हुआ है, जिसका अपना नर्सिग होम है। बाकी सारे पात्र भी नाम और भेष बदलकर मौजूद हैं। 'शोले' के कुछ महत्वपूर्ण दृश्य प्रसंगों को थोड़े बदलाव के साथ पेश करने में रामू मुंह के बल गिरे हैं। रीमेक में कोई भी दृश्य मूल की तरह प्रभावशाली नहीं है। हां, कुछ नए दृश्यों में रामू अपनी छाप के साथ मौजूद हैं। गीत-संगीत और उनका फिल्मांकन रामू की अन्य फिल्मों की तुलना में भी कमजोर है। 'रामगोपाल वर्मा की आग' का कोई भी संवाद याद नहीं रहता। हां, अगर इसे नयी फिल्म की तरह देखें और याददाश्त से 'शोले' निकाल दें तो औसत फिल्मों की श्रेणी में इसे रख सकते हैं। ऐसी मेहनत, प्रतिभा और लागत के साथ रामू ने किसी नए विषय पर मौलिक फिल्म बनायी होती तो करियर और क्रियेटिविटी के लिहाज से बेहतर रहता। '़ ़ ़ आग' से खेलने में रामू जख्मी हो गए हैं। अभिनय की बात करें तो अमिताभ बच्चन और मोहन लाल को एक साथ पर्दे पर देखना किसी दर्शक के लिए यादगार अनुभव से कम नहीं। दोनों ही एक-दूसरे को उम्दा टक्कर देते हैं। '़ ़ ़ आग' का बाक्स आफिस पर जो भी हश्र हो, यह फिल्म अमिताभ की बब्बन सिंह की भूमिका के लिए याद रखी जाएगी। अजय देवगन की प्रतिभा का दुरुपयोग हुआ है। निशा कोठारी अपनी क्षमता से ज्यादा कोशिश करती नजर आती हैं। सुष्मिता सेन सादे रूप में भी अच्छी लगती हैं। नए अभिनेता प्रशांत राज निराश नहीं करते। पहली फिल्म से वह उम्मीद जगाते हैं।

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