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Monday, July 20, 2009

हिन्दी टाकीज:सिनेमा से पहली मुलाकात-मंजीत ठाकुर

हिन्दी टाकीज-४४
मंजीत ठाकुर उत्साही व्यक्ति हैं.लेखक और पत्रकार होने के इस विशेष गुण के धनी मंजीत इन दिनों पूरे देश का भ्रमण कर रहे हैं.अच्छा ही है,दिल्ली की प्रदूषित हवा से जितना दूर रहें.अपने बारे में वे लिखते हैं...
मैं मजीत टाकुर.. वक्त ने बहुत कुछ सिखाया है। पढाई के चक्कर में पटना से रांची और दिल्ली तक घूमा.. बीएससी खेती-बाड़ी में किया। फिर आईआईएमसी में रेडियो-टीली पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा.. सिनेमा की सनक ने एफटीआईआई के चक्कर भी लगवा दिए। नवभारत टाइम्स में सात महीने की संक्षिप्त नौकरी के बाद से डीडी न्यूज़ का नमक खा रहा हूं। फिलवक्त सीनियर कॉरेस्पॉन्डेंट हूं। सिनेमा के साथ-साथ सोशल और पॉलिटिकल खबरें कवर करने का चस्का है। सिनेमा को साहित्य भी मानता हूं, बस माध्यम का फर्क है..एक जगह शब्द है तो दूसरी जगह पर चलती-फिरती तस्वीरें..। सिनेमा में गोविंदा से लेकर फैलिनी तक का फैन हूं..। दिलचस्पी पेंटिंग करने, कविताएं और नॉन-फिक्शन गद्य लिखने और कार्टून बनाने में है। निजी जिंदगी में हंसोड़ हूं, दूसरों का मज़ाक बनाने और खुद मज़ाक बनने में कोई गुरेज़ नहीं। अपने ब्लॉग गुस्ताख पर गैर-जरुरी बातें लिखता हूं.. हल्की-फुल्की तरल बातें..पिछले कुछ महीनों से भारत दर्शन पर हूं, लोकसभा चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल और फिर बजट के दौरान पूरे पूर्वी भारत की सड़क यात्रा ने बेहतरीन तजरबे दिए... फिल हाल गुजरात में हूं...इस उम्मीद में हूं कि सूरज की कोई खास किरण एक दिन मेरे सिर पर पड़ेगी। मानता हूं कि मैं दुनिया का सबसे ज़रुरी पत्रकार बस बनने ही वाला हूं, डीडी के लिए कई डॉक्युमेंट्रीज़ बनाई हैं। लेकिन मेरा सर्वश्रेष्ठ अभी आना बाकी है। आप उनसे sampark करना चाहते हैं to यहाँ likhen...manjit2007@gmail.com

या फ़ोन करें...09871700240


अपने स्कूली दिनों में कायदे से बेवकूफ़ ही था। पढ़ने-लिखने से लेकर सामाजिक गतिविधियों तक में पिछली पांत का खिलाड़ी। क्रिकेट को छोड़ दें, तो बाकी किसी चीज़ में मेरी दिलचस्पी थी ही नहीं। बात तब की है जब मैं महज सात-आठ साल का रहा होऊंगा।॥ मेरे छोटे-से शहर मधुपुर में तब, दो ही सिनेमा हॉल थे, वैसे आज भी वही दो हैं।





लेकिन सिनेमा से पहली मुलाकात, याद नहीं कि कौन सी फिल्म थी वह- मम्मी के साथ हुई थी। मम्मी और कई पड़ोसिनें, मैटिनी शो में फिल्में देखने जाया करतीं। हम इतने छोटे रहे होंगे कि घर पर छोड़ा नहीं जा सकता होगा। तभी हमें मम्मी के साथ लगा दिया जाता होगा। बहनें भी साथ होतीं॥ तो सिनेमा के बारे में जो पहली कच्ची याद है वह है हमारे शहर का मधुमिता सिनेमा..।





इस सिनेमाहॉल की इमारत पहले रेलवे का गोदाम थी। थोड़ा बहुत नक्शा बदल कर इसे सिनेमा हॉल में तब्दील कर दिया था। अब इस हॉल को पुरनका हॉल कहा जाता है। महिलाओं के लिए बैठने का अलग बंदोबस्त था। आगे से काला पर्दा लटका रहता॥ जो सिनेमा शुरु होने पर ही हटाया जाता। तो सिनेमा शुरु होने से पहले जो एँबियांस होता वह था औरतों के आपस में लड़ने, कचर-पचर करने, और बच्चों के रोने का समवेत स्वर।





लेडिज़ क्लास की गेटकीपर भी एक औरत ही थीं, मुझे याद है कुछ ललिता पवारनुमा थी। झगड़ालू॥किसी से भी ना दबने वाली..उसकी पटरी किसी से नहीं खाती। चूंकि हमारे मुह्ल्ले की औरतें प्रायः फिल्में देखनो को जाती तो उस ललिता पवार से उनकी गाढ़ी छनती थी और सीट ठीक-ठाक मिल जाती। शोहदे भी उस वक्त कम ही हुआ करते होंगे, ( अरे जनाब आखिरकार हम तब तक जवान जो नहीं हुए थे) तभी औरतों की भीड़ अच्छी हुआ करती थी।





बहरहाल, फिल्म के दौरान बच्चों की चिल्ल-पों, दूध की मांग, उल्टी और पैखाने के वातावरण में हमारे अंदर सिनेमा के वायरस घर करते गए। हमने मम्मी के साथ जय बाबा अमरनाथ, धर्मकांटा, संपूर्ण रामायण, जय बजरंगबली, मदर इंडिया जैसी फिल्में देखी। रामायण की एक फिल्म में रावण के गरज कर - मैं लंकेश हूं- कहने का अंदाज़ मुझे भा गया। और घर में अपने भाईयों और दोस्तों के बीच मैं खुद को लंकेश कहता था।





मेरे पुराने दोस्त और रिश्तेदार अब भी लंकेश कहते हैं। वैसे लंकेश का चरित्र अब भी मुझे मोहित करता है, और इसी चरित्र की तरह का दूसरा प्रभावी चरित्र मुझे गब्बर और फिर मोगंबो का लगा। लेकिन तब तक मैं थोड़ा बड़ा हो गया था। और मानने लगा था कि अच्छी नायिकाओं का साथ पाने के लिए या तो आपको अच्छा और मासूम दिखने वाला अनिल कपूर होना चाहिए या फिर गुस्सैल अमित।





जब हम थोड़े और बड़े हुए तो उस काले परदे के आगे की दुनिया की खबर लेने की इच्छा बलवती होती गई। तब कर एक और सिनेमाघर शहर में बन गया। सिनेमाघर की पहली फिल्म थी- याराना। सन बयासी का साल था शायद। हम छोटे ही थे, लेकिन भाई के साथ फिल्म देखने के साथ गया। अमिताभ से पहला परिचय याराना के जरिए हुआ।





उस समय तक हमारे क़स्बे में वीडियों का आगाज़ नहीं हुआ था। बड़े भाई आसनसोल से आते तो बताते टीवी और वीडियो के बारे में। हॉल जैसा दिखता है या नहीं?? पता चला बित्ते भर के आदमी दिखते हैं, छोटा सा परदा होता है। निराश हो गया मैं । लेकिन घर पर भी लगा सकते हैं यह अहसास खुश कर गया।





बहरहाल, हमारे शहर में एक राजबाड़ी नाम की जगह है, जहां लड़कों ने आसनसोल से वीडियो लाकर फिल्में दिखाने का फैसला किया था। टिकट था - एक रुपया। औरतो के लिए फिल्म दिखाई जा रही थी-मासूम और एक और फिल्म थी दीवार। मम्मी और उनकी सहेलियां मासूम देखने गईँ। शाम में दीवार दिखाई जानी थी, बाद में जब हम और रतन भैया फिल्म देखकर लौट रहे थे। हम दोनों में विजय बनने के लिए झगड़ा हो गया। वह कहते रहे कि तुम छोटे हो कायदे से रवि तुम बनोगे, लेकिन रवि जैसा ईमानदार बनना मुझे सुहा नहीं रहा था। विजय की आँखों की आग अच्छी लगी और उस दिन के बाद से लगती ही रही। खासकर, विजय के बचपन के किरदारने जूते साफ करते हुए जब डाबर के साथी से कहा- साहब पैसे हाथ में उठाकर दो॥ मैं फेंके हुए पैसे नहीं उठाता। सच कहूं तो उस वक्त मेरा गला रुंध गया था, वीडियो देखते हुए। आज लगता है कि सलीम-जावेद ने कितनी कुशलता से सामूहिक चेतना में आत्मसम्मान की बात पैबस्त कर दी थी।





उस दिन के बाद से फिल्मों का चस्का लग गया। लेकिन घर में एक बदलाव आ गया। आर्थिक कारणों से अब मेरा दाखिला सरकारी स्कूल में करवा दिया गया। वजह-पिताजी का देहांत हो गया था। घर में एक किस्म की संजीदगी आ गई थी। मम्मी, मां में बदल गई। उनके सरला, रानू और बाकी के उपन्यास पढ़ना छूट गया। अचानक मेरी मां मनोरमा और कांदबिनी, सरिता छोड़कर रामचरितमानस का पाठ करने लगा। एक बेहद संजीदा माहौल॥ भारी-भारी-सा। मुझे पिता के देहांत के साथ इस माहौल का भारीपन खलने लगा। बड़े भैया कमाने पर उतरे, मंझले भाई में पढाई का चस्का लगा। मुझे बेवजह ज्यादा प्यार मिलने लगा। घर के लोग सिनेमा से दूर होते गए। सबका बकाया मैं और बड़े भैया पूरा करने लगे। घर के भारीपन से दूर मैं सिनेमाहॉल में जगह तलाश करने लगा।





सरकारी स्कूल से बंक करना कोई मुस्कल काम नहीं था। मैं क्लास से भाग कर सिनेमा देखने जाने लगा। लेकिन तीन घंटे तक स्कूल और घर से दूर रहने की हिम्मत नहीं थी। उन दिनों -८६ का साल था- मधुपुर के सिनेमाघरों में जबरदस्ती इंटरवल के बाद घुस आने वालों को रोकने के लिए एक नई तरकीब अपनाई गई थी। इंटरवल में बाहर निकलते वक्त गेटकीपर एक ताश के पत्ते का टुकडा़ देता था। अब हमने एक और दोस्त के साथ इस तरकीब का फायदा उठाया। इस तरीके में हम इंटरवल के पहले की फिल्म एक दिन और बाद का हिस्सा दूसरे दिन देख लेते थे।





गिरिडीह में सवेरा सिनेमा हो, या देवघर में भगवान टॉकीज, मधुपुर में मधुमिता और सुमेर, आसनसोल में मनोज टॉकीज, हर सिनेमाहॉल का पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा हमें पहचानने लगा। गेटकीपरों के साथ दोस्ती हो गई। फिल्म देखना एक जुनून बन गया। कई बार हमारे बड़े भाई ने सिनेमाहॉल में ही पकड़ कर दचककर कूटा। लेकिन हम पर असर पड़ा नहीं।





बाद में अपने अग्रीकल्चर कॉलेज के दिनों में या बाद में फिल्में पढाई के तनाव को दूर करने का साधन बन गईं। अमिताभ के तो हम दीवाने थे। शुरु में कोशिश भी की अंग्रेजी के उल्टे सात की तरह पट्टी बढा़ने की , लेकिन नाकामी ही हाथ लगी। बाद में शाहरुख ने अमिताभ को रिप्लेस करने की तरकीबें लगाईं, तो डीडीएलजे ने बहुत असर छोड़ा था हम पर। नकारात्मक भूमिकाओं को लेकर मै हमेशा से सकारात्मक रहा हूं। ऐसे में बाजीगर और डर वाले शाहरुख को हमने बहुत पसंद किया था। उसके हकलाने की कला, साजन में संजय के बैसाखी लेकर लंगड़ाने की अदा, अजय देवगन की तरह फूल और कांटे वाला सोशल एलियनेशन, ॥ सब पर हाथ आजमाया। वैसे, बाज़ीगर में शाहरुख जब शिल्पा की हत्या कर देते हैं, तो हमें बड़ा अफ़सोस हुआ था। यार, ऐसे नहीं मारना चाहिए था लड़की को..सुंदर थी।





लेकिन दूरदर्शन की मेहरबानी से फिल्मों से हमारा रिश्ता और मजबूत ही हुआ। दूरदर्शन पर मेरी पहली फिल्म याद नहीं आ रहा कि साल कौन-सा था, लेकिन फिल्म थी समझौता। गाना अब भी याद है समझौता गमो से कर लो॥। फिर अमृत मंथन, अवतार, मिर्च-मसाला, पेस्टेंजी, आसमान से गिरा, बेनेगल निहलाणी की फिल्में देखने का शौक चर्राया।





लगा कि लुटेरे, मरते दम तक, लोहा, एलान-ए-जंग, हिम्मतवाला और तोहफा ॥से इतर भी फिल्में हो सकती हैँ। तो हर तरह की फिल्में देखना शुरु से शौक में शामिल रहा। और दूरदर्शन की इसमें महती भूमिका रही। जिसने कला फिल्में देखने की आदत डाल दी। तो हर स्तर की हिंदी अंग्रेजी फिल्में देखते रहे। हां, डीडी की कृपा से ही ऋत्विक घटक और सत्यजित् रे की फिल्मों से परिचय हुआ। तो सिनेमा एक शगल न रह कर ज़रुरत में बदल गया।





बहुत बाद में २००७ में एफटीआईआई में फिल्म अप्रीशिएशन के लिए पहुंचा तो पता चला कि एक पढाई ऐसी भी होती है जिसमे पढाई के दौरान फिल्मे दिखाई जाती हैं। तो पूरे कोर्स को एंजाय किया। फिल्में देखने और फिल्मे पढ़ने की तमीज आई। विश्व सिनेमा से परिचय गाढा हुआ।





गोवा और ओसियान जैसे फिल्मोत्सवों में ईरानी, फ्रेंच और इस्रायली सिनेमा से दोस्ती हुई और सिनेमा का वायरस मुझे नई जिंदगी दे रहा हैं... मैं हर स्तर के फिल्मे जी रहा हूं, और गौरव है मुझे इस बात का कि दुनिया में सिनेमा एक कला और कारोबार के रुप में जिंदा है तो मेरे जैसे दर्शक की वजह से, जो एक ही साथ रेनुवां-फेलेनी और राय-घटक का मज़ा बी ले सकता है साथ ही गोविंदा के सुख, और रनबीर के सांवरिया भी झेल सकता है।





मेरी पसंद की फिल्में



१. शोले,


२. प्यासा,


३.स्वदेश,


४.काग़ज़ के फूल


५. दीवार


६.जाने भी दो यारों


७. दस्विदानिया ७. अंगूर


८. मौसम


९ गरम हवा


१०. जागते रहो

2 comments:

Science Bloggers Association said...

Rochak sansmaran hai. Shukriya.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

चण्डीदत्त शुक्ल said...

मस्त लिखेला हो बाबू....गजबइ कइ डारा...तू हउवा एकदम असली फ़िलमी....