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Monday, July 13, 2009

हिन्दी टाकीज:जाने कहां गये वो सिनेमा के दिन ...-पूनम चौबे


हिन्दी टाकीज-४३

पूनम चौबे नयी पीढ़ी की पत्रकार हैं। अंग्रेजी की छात्रा हैं मगर लिखना-पढ़ना हिंदी में करती हैं। कुछ नया करने का जज्‍बा इन्‍हें पत्रकारिता में घसीट लाया है। कुछ कहानियां भी लिख चुकी हैं। मगर किसी एक विधा पर टिके रहना अपनी तौहीन समझती हैं। सो फिलहाल पहचान कहां और कैसे बनेगी, इसी में सर खपा रही हैं।

बचपन की यादों में शुमार मूवी देखने का खुमार। बरबस यह जुमला इसलिए याद आ रहा है क्‍योंकि आज भी पिक्‍चर हॉल में जाकर फिल्‍में देखने में वही मजा आता है, जो दस-बारह साल पहले था। आज भी वो यादें धुंधली नहीं पड़ीं जब मेरी जिद पर डैडी हम चारों भाई-बहनों को फिल्‍म दिखाने ले गये थे। 1996 की वह सुहानी शाम, शुक्रवार का दिन, फिल्‍म थी 'हम आपके हैं कौन' पिक्‍चर हॉल जाने के लिए डैडी से ढेरों मिन्‍नतें करनी पड़ती थीं। कारण था उनकी ऑफिस से छुट्टी न मिलना। फिर भी उस शुक्रवार की शाम को तो मैं अपनी जिद पर अड़ी रही। आखिरकार हम पिक्‍चर हॉल पहुंचे। टिकट लेने के बाद जैसे ही उस बड़े हॉल के कमरे में पहुंचे, लगा मानो, भूतों के महल में आ गये हों। ऐसा धुप अंधेरा। क्‍या ऐसा ही होता है सिनेमाघर? मुझे लगा यहां बिजली की कोई समस्‍या होगी। खैर, टिकट चेक करने वाले की टॉर्च की रोशनी ने मुझे और मेरे परिवार को हमारी सटी से मुखातिब कराया। फिल्‍म शुरू हुई पर ये क्‍या? आवाजें इतनी तेज कि कान मनो अभी फट पड़ेंगे। हर रोमांटिक सीन पर कुछ लड़कों की सीटी सुनायी देती। वैसे में भी इस कला में निपुण थी। मुझे लगा ये कोई परंपरा है। बस मैंने भी अपनी कला का एक नजारा दिखा ही दिया। लेकिन फिर पिताजी की डांट के बाद मैं दोबारा अपनी इस कला का प्रदर्शन नहीं कर पायी। मुझे दूसरी बार हैरत उस समय हुई जब इंटरवल होने के साथ ही रोशनी से पूरा सिनेमाहाल नहा गया। डैडी ने हम चारों भाई-बहनों को हॉल की कैंटीन में चलने को कहा ताकि हम कुछ खा-पी सकें। पर मुझे डर था कि कहीं कोई मेरी सीट पर बैठ गया तो क्‍या होगा। यह डर और ऊपर से सिनेमा का रोमांच, दोनों मेरे ऊपर इस तरह से हावी थे कि मैंने कैंटीन जाने का प्रस्‍ताव ठुकरा दिया और अपने भाई-बहनों को वहीं, मेरी सीट पर कुछ लाने के लिए कह दिया।

आखिरकार मैंने अपने इस डर को छुपाकर बाकी लोगों को ही मेरे लिए कुछ लाने को कह दिया। तीन घंटे के बाद जब हॉल से बाहर निकली तो पूरे रास्‍ते बस फिल्‍म की ही चर्चा चलती रही। चाहे जो कुछ हो, पर मजा तो बहुत आया इस फिल्‍म में। इसके बाद दूसरी फिल्‍म 'साजन चले ससुराल' देखा। पिक्‍चर हॉल में अंधेरा होने की वजह से गलती से मम्‍मी की जगह किसी और आंटी को न जाने कितनी बार हर सीन पर कमेंट करने के नये-नये नुस्‍खे बताती रही। इंटरवल में पता चला कि मम्‍मी मेरे बाएं नहीं बल्कि दाएं साइड में बैठी थी। इसके बाद एक-दो मौके और भी आएं, जब फैमिली के साथ फिल्‍में देखने का मौका मिला। एक बार तो मेरी छोटी बहन ने हॉल में कॉकरोच को देख कर ऐसा तहलका मचाया कि उफ्फ, पूरी फिल्‍म मानों कॉकरोच बेस्‍ड फिल्‍म हो गयी थी। हर पांच मिनट पर कॉकरोच को देखने का आतंक पूरी फिल्‍म का मजा ही किरकिरा कर दिया। हां 'कुछ कुछ होता है' देखने के बाद कुछ दिनों तक काजोज जैसे बाल रखने का जो खुमार चढ़ा, वह ग्रेजुएशन तक उतरा ही नहीं। फिल्‍म भी काफी रोमांचक लगी और इसे देखने का नतीजा यह निकला कि इसे पूरे 25 बार देखने के बाद आज भी किसी फिल्‍म को देखते वक्‍त मेरे जेहन में आ जाती है। करीब चार साल पहले फिल्‍म 'बागवान' देखने का मौका मिला। चूंकि इस बार यह फिल्‍म देखना किसी करीबी दोस्‍त की तरफ से एक निमंत्रण था। हमलोग कुछ चार दोस्‍त इस आमंत्रण का हिस्‍सा बने थे। पूरी प्‍लानिंग के अनुसार यह तय हुआ कि सभी लोग ठीक पौने 12 बजे तक पिक्‍चर हॉल के बाहर मिलेंगे। मुझे थोड़ी देर हो गई। करीब बारह बज कर दस मिनट पर मैं जब हॉल पहुंची, तो मेरे बाकी दोस्‍त फिल्‍म के लुत्‍फ उठाने में मशगुल हो चुके थे। उन्‍हें यह ध्‍यान नहीं आया कि मैं उस पिक्‍चर हॉल के लिए नहीं नहीं, बल्कि उस शहर के लिए भी नयी थी। अब हॉल पहुंचने के बाद मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर अब क्‍या करूं। किसी तरह हॉल के अंदर जाने का रास्‍त खोजा और अंदर पहुंच गई। मगर टिकट तो मेरे पास था ही नहीं। तब मेरे पास मोबाइल जैसी संचार सुविधा का भी अभाव था। इतनी भीड़ में दोस्‍तों को कैसे खोजूं। और जब तक टिकट पास नहीं होगा सीट मिलने का तो सवाल ही नहीं था। जब टिकट चेकर ने मेरे पास आकर मुझसे टिकट मांगा, तो मेरे दिमाग में भी एक नयी घंटी बजी। मैंने उसे थोड़े कड़े आवाज में यह कहते हुए डांट पिलायी कि एक तो मेरे दोस्‍त मुझसे बिछड़ गये हैं और उस पर आपको टिकट की पड़ी है। आपके हॉल का पूरा सिस्‍टम ही बेहद फालतू लगता है। अगर इस भीड़ में कोई खो जाये, तो शायद पूरी फिल्‍म खत्‍म हो जाये मगर वह आदमी न मिले। पहली बार इस शहर में आयी और ऐस देखने को मिला। इस शहर के ऊपर की गयी मेरी सारी रिसर्च बेकार जायेगी। कहां मैं इसके बारे में लंबी-लंबी तारीफों के पुल बांध रही थी और कहां ये... बस-बस पूनम, रहने दो। हमें मालूम हो चुका है कि तुम आ गयी हो। पीछे से मेरे दोस्‍त ने मेरी बात बीच में काटते हुए मुझे पुकारा। थैंक गॉड मेरी जान में जान आ गयी। वह टिकट चेकर तो बस मेरा मुंह देखे जा रहा था। कुछ लोग भी भौचक्‍के से मुझे और मेरे दोस्‍त को देखे जा रहे थे। आखिरकार किसी तरह उसने उनलोगों को शांत कराया और मुझे मेरी सीट तक लाकर अच्‍छी-खासी डांट भी मुफ्त में दे दी। पर मुझे तो इस बात की खुशी थी कि कुछ भी हो मैंने तो बाजी मार ली। दोस्‍त भी मिल गये और पिक्‍चर का मजा, भले ही इस हो-हल्‍ला के चक्‍कर में 20 मिनट की फिल्‍म से हाथ धोना पड़ा, पर मजा खूब आया। वेसे आज भी उन दिनों जैसी बदमाशियों का सिलसिला थमा नहीं। मौका मिला नहीं कि मैं फिर से वैसे कारनामे करने को तैयार हो जाती हूं।
मेरी पसंदीदा फिल्‍में :

१.मोहब्‍बतें

२.परदेस

३.वीर-जारा

४.बागवान

५.हम साथ-साथ हैं

६.विवाह

७.हेरा-फेरी।

८.वेलकम टू सज्‍जनपुर

९.जाने तू या जाने ना



4 comments:

Manjit Thakur said...

अच्छा अनुभव रहा होगा.. लिखावट से जाहिर है। सिनेमा ने कितने रंगीन अनुभव दिए हैं, हमारे भी हैं। साधुवाद। अजय जी को कि ऐसी बेशकीमती निजी अभिव्यक्तियों को जगह दे रहे हैं।

Manjit Thakur said...

अच्छा अनुभव रहा होगा.. लिखावट से जाहिर है। सिनेमा ने कितने रंगीन अनुभव दिए हैं, हमारे भी हैं। साधुवाद। अजय जी को कि ऐसी बेशकीमती निजी अभिव्यक्तियों को जगह दे रहे हैं।

anand bharti said...

Anubhav achha laga padhkar lekin aapne agar shahron ka naam bataya hota toh padhne wale aapko relate kar sakte the uss mahoul se.

Rakesh Kumar Singh said...

शानदार अनुभव. पर शहर का नाम लिख देतीं तो शायद और रिलेट कर पाता. इस श्रृंखला का फायदा एक यह भी कि अलग अलग शहरों में सिनेमा के रंग देखने को मिल जाते हैं.