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Thursday, July 30, 2009

दरअसल:नौ साल की बच्ची के ख्वाब


-अजय ब्रह्मात्मज


रुबीना अली ज्यादा परिचित नाम नहीं लगता, लेकिन स्लमडॉग मिलेनियर के साथ इस नाम को जोड़ दें, तो कम से कम शहर के लोग इस नाम और चेहरे को जरूर पहचान जाएंगे। रुबीना मुंबई के बांद्रा इलाके में स्थित गरीब नगर झोंपड़पट्टी की बच्ची है। उसने स्लमडॉग मिलेनियर में काम किया था और इसी के सिलसिले में वह ऑस्कर के रेड कार्पेट पर घूम आई। तब से वह और उसका साथी कलाकार अजहर सुर्खियों में है। कभी उनके झोंपड़े गिराए जाते हैं, तो कभी उन्हें फ्लैट मिल जाते हैं। कभी कोई उनकी पढ़ाई का खर्चा उठाने को तैयार मिलता है, तो कभी कुछ और कभी कुछ और। हाल ही में रुबीना अली की आत्मकथा प्रकाशित हुई है। रुबीना अभी ठीक से लिखना-पढ़ना नहीं जानती.., वह ठीक से बोल भी नहीं पाती है, लेकिन उसकी आत्मकथा छपकर आ गई है। मालूम नहीं कि अपनी आत्मकथा में लिखे शब्द और वाक्यों का वह सही मतलब समझती भी है या नहीं? आत्मकथा के आखिरी अध्याय में रुबीना ने बताया है कि एक फ्रांसीसी प्रकाशक ने मेरी जीवनी में रुचि दिखाई। मुझे भी अच्छा लगा, क्योंकि मैं अपनी जिंदगी के बारे में लोगों को बता सकूंगी कि मैं क्या हूं?
झोंपड़पट्टी की बच्ची रुबीना की यह कहानी स्पष्ट रूप पर भारतीय पाठकों को ध्यान में रखकर नहीं लिखी गई है। एन बर्थोड और दिव्या डुगर ने मिलकर इसे फ्रांस और दूसरे देशों के पाठकों के लिए लिखा है। आत्मकथा में कई जगह भारत में प्रचलित चीजों को इस तरह समझाया गया है, जैसे किसी विदेशी को बता रहे हों कि हमारे देश में ऐसा होता है। यह अंतर्पाठ रुबीना के जीवनीकारों ने किया है। उन्होंने रुबीना की कही बातों को विदेशी पाठकों को समझाने की गरज से ही लिखा है।
स्लमगर्ल ड्रीमिंग नाम की यह पुस्तक बांद्रा के गरीब नगर इलाके में रह रही रुबीना की जिंदगी में गहराई से नहीं उतरती। जीवनीकारों का वह मकसद भी नहीं रहा होगा। उन्हें ऑस्कर के लिए सम्मानित हो चुकी फिल्म स्लमडॉग मिलेनियर की बाल कलाकार रुबीना की जीवनी जल्दी से प्रकाशित कर फिल्म की मची गूंज के बीच ही कुछ कर लेना था। रुबीना ने बताया है कि इस पुस्तक से होने वाली आय का आधा हिस्सा चैरिटी में और आधा हिस्सा उसकी पढ़ाई-लिखाई और करियर के आवश्यक प्रशिक्षण में खर्च किया जाएगा। रुबीना की आत्मकथा एक उद्देश्य तो पूरा करती है। इस पुस्तक की आय से उसका भविष्य सुनिश्चित हो जाएगा।
गरीब नगर झोंपड़पट्टी की विस्मित बच्ची रुबीना के अनुभव और संस्मरण में लक-दक दुनिया से परिचित होने का कौतूहल है। वह अभी चमकदार क्षणिक दुनिया और अपनी वास्तविक जिंदगी के ऊहापोह में फंसी हुई है। गरीब नगर के पास बहते नाले के पास दौड़ती-फिरती उसकी जिंदगी उसके कमरे से कई गुना बड़े होटल के आलीशान कमरे में पहुंच कर बेचैन नहीं होती है। उसे इस फर्क का एहसास नहीं है। वह तो ख्वाबों में डोल रही है। खुली आंखों से इस सपनीली दुनिया में विचर रही है। उसकी आत्मकथा में कोई पीड़ा नहीं है। वह अपने अतीत और वर्तमान को लेकर लज्जित नहीं है। हां, उसके सपने मजबूत हो गए हैं। अब उसे लगने लगा है कि बड़ी होकर वह भी प्रीति जिंटा बन सकती है। अनिल कपूर उसके लिए पर्दे पर चलते-फिरते अभिनेता मात्र नहीं हैं। वह उनसे हाथ मिला चुकी है। बातें कर चुकी है। ऑस्कर के रेड कार्पेट पर उनके साथ चल चुकी है।
स्लमगर्ल ड्रीमिंग चूंकि सुनकर लिखी गई आत्मकथा है, इसलिए इसमें नौ साल की उम्र की मासूमियत शब्दों में ढलते समय सांचे में नहीं आ पाई है। विवरणात्मक शैली में लिखी गई आत्मकथा द्रवित और प्रभावित नहीं करती।रुबीना बड़ी होने पर शायद अपनी आत्मकथा दोबारा लिखे, तो हम उसके एहसास को सही तरीके से समझ पाएंगे।

2 comments:

Manjit Thakur said...

ख्वाबों के भी रंग होते हैं रुबीना के सपने से पिरचित कराने के लिए साधुवाद

Science Bloggers Association said...

Sahi kaha aapne.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }