दरअसल...कॉमेडी का गिरता स्तर


-अजय ब्रह्मात्मज



कॉमेडी फिल्मों का बाजार गर्म है। दर्शक देख रहे हैं, इसलिए निर्माता-निर्देशकों को कॉमेडी फिल्मों में मुनाफा दिख रहा है। दरअसल, आजकल निर्माता कॉमेडी फिल्मों में निवेश के लिए तैयार हो जाते हैं। डेविड धवन, प्रियदर्शन, इंद्र कुमार और नीरज वोरा सरीखे निर्देशकों की चांदी हो गई है। किसी निर्देशक ने एक भी सफल कॉमेडी फिल्म बना ली है, तो उसे प्रोड्यूसर और एक्टर की दिक्कत नहीं होती।
पहले कॉमेडी फिल्मों में कॉमेडियन की जरूरत पड़ती थी। बाद में संजीव कुमार, धर्मेद्र और अमिताभ बच्चन ने अपनी फिल्मों में कॉमेडी की और धीरे-धीरे वे ऐसी फिल्मों के नायक भी बन बैठे। पिछले एक दशक में सारे एक्टर कॉमेडी में किस्मत आजमा चुके हैं। हर तरफ हंसी बिखेरी जा रही है। तर्क दिया जा रहा है कि सोसायटी में इतना टेंशन है कि दर्शक रिलीफ के लिए सिनेमाघर में आता है। अगर वहां भी दर्शकों की लाइफ का टेंशन ही चित्रित किया जाए, तो उन्हें क्या खाक मजा आएगा?
एक जमाना था, जब हिंदी की रोमांटिक और सामाजिक फिल्मों में कॉमेडी ट्रैक रखे जाते थे। तब के डायरेक्टर यह मानते थे कि तीन घंटे की फिल्म देखते समय दर्शकों को थोड़ी राहत मिलनी चाहिए। जॉनी वॉकर से लेकर जॉनी लीवर तक यह परंपरा किसी-न-किसी रूप में चलती रही। इधर उनकी पोजिशन कमजोर हो गई है। एक वजह तो यही है कि सारे हीरो कॉमेडी करने लगे हैं। इधर की कॉमेडी फिल्में देखें, तो इन में हास्य का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। साधारण लतीफों और हास्य दृश्यों को जोड़कर फिल्में बनाई जा रही हैं। डेविड धवन और प्रियदर्शन ने अपनी फिल्मों की एक शैली पकड़ ली है और वे खुद को लगातार रिपीट कर रहे हैं। डेविड मुख्य रूप से मेनस्ट्रीम के स्टारों को लेकर ही कॉमेडी फिल्में बनाते हैं। उनकी फिल्मों में कहानी और संवाद से ज्यादा जोर स्टारों पर रहता है। उनकी फिल्मों में सलमान खान, गोविंदा और दूसरे स्टार अपनी हरकतों से हंसाते हैं। प्रियदर्शन की फिल्मों में अक्षय कुमार और परेश रावल स्थायी चेहरे हो गए हैं। इधर राजपाल यादव भी उनकी फिल्म में रेगुलर दिख रहे हैं। ये सारे किरदार कन्फ्यूजन क्रिएट करते रहते हैं। फिल्म के क्लाइमेक्स तक कन्फ्यूजन इतना बढ़ जाता है कि दर्शक हैरान होते हैं और फिल्म नुकसान में रहती है।
दरअसल.., कॉमेडी को फटाफट कमाई का जरिया समझ लिया गया है। इसमें अन्य खर्चे कम हो जाते हैं। दो स्टार भी हों, तो बाकी कैरेक्टर और जूनियर आर्टिस्ट को लेकर फिल्म बन जाती है। कई दर्शक सवाल पूछते हैं कि अब पहले जैसी कॉमेडी फिल्में क्यों नहीं बनतीं? निर्माता-निर्देशकों ने मान लिया है कि दर्शक इंटेलिजेंट कॉमेडी को समझ नहीं पाते। अगर अभी कोई निर्माता जाने भी दो यारो बनाएगा, तो दर्शक उसे जाने भी दो निर्देशक महोदय कहते नजर आएंगे। ऐसा माना जा रहा है कि तुरंत खुशी की तलाश में दर्शक हंसने के लिए दिमाग पर जोर नहीं डालना चाहते। सच्चाई क्या है? उदाहरण के लिए पार्टनर और धमाल जैसी फिल्में काफी हैं.

Comments

यह मुश्किल दर्शकों की नहीं, निर्माता-निर्देशकों की ज्यादा है. सिनेमा की दुनिया की भेड़ चाल इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है. मौलिकता कहीँ दिखती नहीं और इसीलिए साहस भी नहीं है. ऐसे में यही होगा.

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